फरीदाबाद: दो महीने की मेहनत, दिन-रात की मशक्कत और दशहरे पर अच्छी कमाई की उम्मीद. लेकिन एक दिन की बारिश ने गरीब कारीगरों की सारी मेहनत पर पानी फेर दिया. फरीदाबाद में सड़क किनारे रावण और कुंभकरण के पुतले बनाने वाले परिवारों के सामने अब रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है. झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले ये परिवार पूरे साल दशहरे के त्योहार का इंतजार करते हैं, क्योंकि पुतले बनाकर बेचने से ही उन्हें कुछ अच्छी कमाई होने की उम्मीद रहती है. लेकिन बारिश के पानी ने उनके बनाए कई पुतलों को खराब कर दिया है. कारीगरों के मुताबिक, उन्हें करीब 50 हजार से 60 हजार रुपये तक का नुकसान हुआ है.
दो महीने पहले शुरू कर दिया था पुतले बनाने का काम
कारीगरों ने बताया कि दशहरे पर पुतलों की मांग को देखते हुए उन्होंने करीब दो महीने पहले ही काम शुरू कर दिया था. पांच फीट से लेकर 25 से 30 फीट तक के रावण के पुतले तैयार किए जाते हैं. इन्हें बनाने में बांस, कागज और दूसरे सामान के साथ काफी मेहनत लगती है. कई बार काम करते हुए हाथ-पैर तक छिल जाते हैं. लेकिन त्योहार पर होने वाली कमाई की उम्मीद में पूरा परिवार इस काम में जुटा रहता है.
कितने में बिकता है रावण का पुतला?
कारीगर पिंटू बताते हैं कि उनके पास पांच फीट से लेकर 25 से 30 फीट तक के रावण के पुतले मिलते हैं. 10 फीट के रावण के पुतले की कीमत करीब 10 हजार रुपये होती है, जबकि बड़े पुतलों की कीमत 13 हजार रुपये या इससे अधिक तक होती है. हालांकि, अलग-अलग आकार के पुतलों की कीमत अलग-अलग होती है. बारिश के कारण कागज भीगने और गलने से कई पुतले खराब हो गए हैं. इससे तैयार माल बिकने की उम्मीद कम हो गई है और उनकी लागत फंसने का खतरा बढ़ गया है.
बारिश से 50 से 60 हजार रुपये का नुकसान
पिंटू ने बताया कि बारिश से कम से कम 50 हजार से 60 हजार रुपये तक का नुकसान हुआ है. यह नुकसान खराब हुए पुतलों और उन पर लगी मेहनत से जुड़ा है. इसे उनकी कुल कमाई या मुनाफा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि पुतलों की बिक्री से मिलने वाली रकम में से सामान और दूसरे खर्च भी निकालने होते हैं. अब दशहरे में कुछ ही दिन बचे हैं और उनके पास खराब पुतलों को ठीक करने या नया माल तैयार करने के लिए बहुत कम समय है.
‘पूछने वाले बहुत हैं, मदद करने वाला कोई नहीं’
पिंटू ने बताया कि नुकसान के बारे में पूछने के लिए कई लोग आते हैं, लेकिन मदद की बात आती है तो कोई आगे नहीं आता. बारिश से कागज के पुतले खराब हो गए हैं और अब उनके सामने परिवार का खर्च चलाने की चिंता है. कारीगर शिबा ने बताया कि पुतले बनाने में बहुत मेहनत लगती है और हाथ-पैर तक छिल जाते हैं. इसके बावजूद वह हर साल दशहरे के लिए पहले से तैयारी करते हैं, क्योंकि यही उनके परिवार की कमाई का प्रमुख जरिया है.
बारिश ने परिवारों की रोजी-रोटी पर लगाया ग्रहण
इन कारीगरों के परिवार सड़क किनारे बनी झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं. छोटे-छोटे बच्चे भी पुतले बनाने के काम में हाथ बंटाते हैं, ताकि त्योहार के दौरान कुछ कमाई हो सके. लेकिन बारिश ने उनकी उम्मीदों को बड़ा झटका दिया है. अब उन्हें चिंता है कि खराब हुए पुतलों के नुकसान की भरपाई कैसे होगी और परिवार का खर्च कैसे चलेगा. दशहरे से पहले इन कारीगरों को उम्मीद है कि उनके बचे हुए पुतले बिक जाएंगे और कम से कम उनकी लागत का कुछ हिस्सा वापस मिल सकेगा.









