अंबाला: शारदीय नवरात्रि का पर्व शुरू होते ही मां दुर्गा के जयकारों से मंदिर गूंजने लगे हैं. शक्ति की उपासना के इस पर्व पर अंबाला के प्राचीन मां अंबिका देवी मंदिर में भी सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिल रही है. लेकिन यह मंदिर केवल आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि अंबाला के इतिहास और उसकी पहचान से जुड़ी एक खास धरोहर भी है. दरअसल, स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, मां अंबा देवी के नाम से ही अंबाला का नाम पड़ा था. यही वजह है कि नवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर का महत्व और भी बढ़ जाता है.
बता दें कि 300 साल से अधिक पुराना बताया जाने वाला यह मंदिर आज भी अपनी प्राचीन कारीगरी और दीवारों व छतों पर बनी खूबसूरत पेंटिंग के जरिए बीते समय की झलक दिखाता है. वहीं, शारदीय नवरात्रि के पहले दिन मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है. मान्यता है कि नवरात्रि के नौ दिनों में विधि-विधान से माता रानी की आराधना करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है. इसी आस्था के साथ श्रद्धालु मां अंबिका देवी के दर्शन करने पहुंच रहे हैं. नवरात्रि को लेकर मंदिर में विशेष तैयारियां की गई हैं.
कोलकाता से मंगवाए गए फूलों से होगा माता रानी का विशेष श्रृंगार
वहीं, लोकल 18 को अधिक जानकारी देते हुए मंदिर के पुजारी जतिन शर्मा ने बताया कि माता रानी के विशेष श्रृंगार के लिए कोलकाता से फूल मंगवाए गए हैं. उन्होंने कहा कि नवरात्रि के दौरान प्रतिदिन मां अंबिका देवी का अलग-अलग तरीके से श्रृंगार किया जाएगा. इसके अलावा, शाम के समय ड्राई फ्रूट्स से भी माता रानी का विशेष श्रृंगार किया जाता है. बाद में इन ड्राई फ्रूट्स को प्रसाद के रूप में श्रद्धालुओं में बांट दिया जाता है. इस विशेष परंपरा को लेकर भी भक्तों में उत्साह देखने को मिल रहा है.
दुर्गम राक्षस के वध से जुड़ी है मां अंबिका देवी की मान्यता
मंदिर के पुजारी जतिन शर्मा ने बताया कि मां अंबिका देवी को आदिशक्ति के स्वरूप में पूजा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में मां ने दुर्गम नामक राक्षस का वध किया था, जिसके बाद उन्हें मां दुर्गा के स्वरूप में भी पूजा जाने लगा. पुजारी के अनुसार, यह मंदिर अंबाला की स्थापना से भी पहले का माना जाता है. स्थानीय मान्यता है कि शहर का नाम मां अंबा देवी के नाम पर पड़ा था. मंदिर की प्राचीन बनावट इसकी खास पहचान है.
यहां की दीवारों और छतों पर बनी पेंटिंग तथा पुराने समय की कारीगरी श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है. नवरात्रि के दौरान यहां आने वाले भक्तों के लिए यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ शहर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने का भी अवसर बन जाता है. उन्होंने कहा कि यहां मां अंबा देवी की पिंडी रूप में पूजा की जाती है और माता की प्राचीन पिंडी आज भी इस मंदिर में विराजमान है.
50 साल से मंदिर में दर्शन करने आ रहे हैं श्रद्धालु
वहीं, मंदिर में दर्शन करने पहुंचे श्रद्धालु अमरनाथ ने बताया कि उनका इस मंदिर से करीब 50 साल पुराना जुड़ाव है. वह बचपन से यहां आते रहे हैं और उनसे पहले उनके माता-पिता तथा पूर्वज भी नियमित रूप से मंदिर में माथा टेकने आते थे. उन्होंने कहा कि नवरात्रि के सभी नौ दिनों में वह सुबह-शाम मां के दर्शन करने आएंगे.
मनोकामनाएं लेकर माता रानी के दरबार में पहुंचते हैं भक्त
वहीं, अंबाला शहर के मॉडल टाउन क्षेत्र के निवासी अमित कुमार ने बताया कि मां अंबिका देवी मंदिर के प्रति उनकी गहरी आस्था है. उन्होंने कहा कि वह अपनी मनोकामनाएं लेकर माता रानी के दरबार में आते हैं. नवरात्रि की शुरुआत पर मंदिर में माथा टेकने के बाद वह घर में मां शेरावाली के कलश की स्थापना करेंगे.
पंजाब और हिमाचल प्रदेश से भी दर्शन करने पहुंचते हैं श्रद्धालु
श्रद्धालुओं के अनुसार, मां अंबिका देवी मंदिर में केवल अंबाला ही नहीं, बल्कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश के विभिन्न जिलों से भी भक्त दर्शन करने पहुंचते हैं. नवरात्रि के दौरान मंदिर में बढ़ती भीड़ इस स्थान की धार्मिक महत्ता को दर्शाती है.
आस्था के साथ अंबाला की ऐतिहासिक विरासत से भी जुड़ा है मंदिर
इस तरह मां अंबिका देवी का यह प्राचीन मंदिर नवरात्रि की आस्था, माता रानी की पूजा-अर्चना और अंबाला की ऐतिहासिक पहचान को एक साथ जोड़ता है. यहां हर साल उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ बताती है कि समय बदलने के बावजूद लोगों की आस्था और अपनी सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव आज भी कायम है.







