Faridabad News: सोशल मीडिया पर हथियारों के साथ तस्वीरें, रील और खुद को दबंग दिखाने का शौक युवाओं के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है. हाल ही में अभिनेता टाइगर श्रॉफ से जुड़े फायरिंग मामले में भी हरियाणा के कुछ युवाओं के नाम सामने आने की खबरों ने इस विषय पर ध्यान खींचा है. वहीं, लॉरेंस बिश्नोई जैसे गैंगस्टरों के नाम और तस्वीरों को लेकर भी युवाओं के बीच आकर्षण की चर्चा होती रहती है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर युवा अपनी पहचान बनाने के लिए किस रास्ते को चुन रहे हैं. फरीदाबाद में लोकल18 ने लोगों से बातचीत की, जिसमें उन्होंने युवाओं की परवरिश, शिक्षा, सोशल मीडिया के इस्तेमाल और रोजगार जैसे मुद्दों पर अपनी राय रखी. लोगों का कहना है कि युवाओं को सही दिशा देने के लिए परिवार, शिक्षण संस्थानों और सरकार को मिलकर प्रयास करने की जरूरत है.
फिल्मों और गानों का असर, प्रभावित हो रहे युवा
बबलू हुड्डा बताते हैं कि युवाओं के बीच गन कल्चर को बढ़ावा देने में फिल्मों और गानों का भी असर हो सकता है. जब फिल्मों और गानों में हथियारों का प्रदर्शन, दबदबे की छवि और हिंसा को बार-बार दिखाया जाता है, तो कुछ युवा उससे प्रभावित हो सकते हैं. हालांकि, हर युवा पर इसका एक जैसा असर नहीं होता. युवाओं को अपनी पहचान बनाने के लिए शिक्षा, मेहनत और अपनी प्रतिभा पर ध्यान देना चाहिए. बेरोजगारी, भटकाव और सही मार्गदर्शन की कमी भी कुछ युवाओं को गलत संगति की ओर ले जा सकती है. इसलिए इस विषय को केवल एक वजह से जोड़कर देखने के बजाय इसके अलग-अलग पहलुओं पर ध्यान देना चाहिए.
गैंगस्टर की नकल कर रहे युवा
गोमती दास बताते हैं कि सोशल मीडिया पर खुद को लोकप्रिय दिखाने की चाह भी युवाओं को प्रभावित कर सकती है. आज कई युवा तस्वीरों और वीडियो के जरिए अपनी पहचान बनाना चाहते हैं. इस कोशिश में कुछ युवा ऐसे लोगों की नकल करने लगते हैं, जिनकी छवि दबंग या गैंगस्टर जैसी दिखाई जाती है. युवाओं को सोशल मीडिया के साथ-साथ किताबें पढ़ने और महापुरुषों के विचारों को जानने के लिए भी समय निकालना चाहिए. स्वामी विवेकानंद, गुरु नानक देव, भगवान श्रीकृष्ण और कबीर दास जैसे महापुरुषों के विचार युवाओं को जीवन में सही दिशा चुनने की प्रेरणा दे सकते हैं.
सही और गलत के बीच अंत समझाना जरूरी
देवेंद्र सिंह बताते हैं कि हथियारों के साथ फोटो खिंचवाना या रील बनाकर खुद को बदमाश दिखाना युवाओं के भविष्य के लिए सही रास्ता नहीं है. बच्चों को बचपन से ही सही और गलत के बीच अंतर समझाना जरूरी है. परिवार बच्चों की आदतों, दोस्तों और गतिविधियों पर ध्यान दे, ताकि समय रहते सही सलाह दी जा सके. शिक्षक भी यही चाहते हैं कि उनके विद्यार्थी पढ़-लिखकर आगे बढ़ें और जीवन में कोई गलत कदम न उठाएं. परिवार और स्कूल के बीच बेहतर तालमेल से युवाओं को सही दिशा देने में मदद मिल सकती है.
बच्चों से करें बात-चीत, परेशानियों को भी समझे
शिवराम बताते हैं कि माता-पिता को अपने बच्चों की दिनचर्या और उनके साथ रहने वाले लोगों के बारे में जानकारी रखनी चाहिए. बच्चों को केवल पढ़ाई के लिए कहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनसे बातचीत करना और उनकी परेशानियों को समझना भी जरूरी है. माता-पिता को यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि बच्चे कहां जा रहे हैं, किसके साथ समय बिता रहे हैं और सोशल मीडिया पर किस तरह की सामग्री देख रहे हैं. शिवराम का मानना है कि युवाओं को सही रास्ते पर रखने में परिवार की भूमिका महत्वपूर्ण है. इसके साथ ही सरकार को भी युवाओं के लिए बेहतर अवसर उपलब्ध कराने और उन्हें जागरूक करने की दिशा में काम करना चाहिए.
हथियारों का प्रदर्शन कामयाबी का पैमाना नहीं
स्थानीय लोगों की बातचीत से यह बात सामने आती है कि युवाओं को सही दिशा देने के लिए केवल किसी एक व्यक्ति या संस्था पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. परिवार में संवाद, स्कूलों में सही मार्गदर्शन, सोशल मीडिया का जिम्मेदार इस्तेमाल और युवाओं के लिए शिक्षा व रोजगार के अवसर इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकते हैं. हथियारों का प्रदर्शन किसी की असली पहचान या कामयाबी का पैमाना नहीं है. युवाओं को अपनी प्रतिभा, मेहनत और अच्छे कामों से पहचान बनाने के लिए प्रेरित करना जरूरी है. साथ ही, गैंगस्टरों की छवि से प्रभावित होने के बजाय कानून का सम्मान करने और अपने भविष्य पर ध्यान देने का संदेश भी समाज तक पहुंचना चाहिए.










