हरियाणा में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए सुरक्षा कवच बनने के बजाय धीरे-धीरे भरोसे का संकट बनती जा रही है। हालात ऐसे हैं कि बीते 7 वर्षों में योजना का दायरा करीब 57 प्रतिशत तक घट गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्राकृतिक आपदाओं से फसल खराब होने के बावजूद बीमा क्लेम के भुगतान में लगातार देरी मानी जा रही है।
दैनिक भास्कर के मुताबिक यह स्थिति तब है, जब वर्ष 2016 से अब तक किसानों ने फसल बीमा के नाम पर 7,651 करोड़ रुपये से अधिक का प्रीमियम जमा कराया, लेकिन इसके बदले बीमा कंपनियों से करीब 7,003 करोड़ रुपये का ही मुआवजा मिला। यानी कंपनियों ने प्रीमियम राशि से 648.08 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर ली, फिर भी किसानों को समय पर भुगतान नहीं किया जा रहा।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि खरीफ 2025 सीजन में जुलाई-अगस्त के दौरान आई बाढ़ से खराब हुई फसलों का अब तक किसी भी किसान को क्लेम नहीं मिला। इतना ही नहीं, कई किसानों के रबी फसलों के क्लेम भी अब तक लंबित हैं।
विधानसभा में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, बीमा कंपनियों पर पिछले तीन सालों के 116 करोड़ रुपये से ज्यादा के क्लेम बकाया हैं, जबकि नियमों के अनुसार सर्वे के बाद 15 से 30 दिन के भीतर भुगतान होना चाहिए।
क्लेम में देरी और कंपनियों की मनमानी का सीधा असर योजना में किसानों की भागीदारी पर पड़ा है। योजना की शुरुआत के कुछ वर्षों बाद 2019 में करीब 28 प्रतिशत फसलों का बीमा कराया गया था, लेकिन यह आंकड़ा 2025 के खरीफ सीजन में घटकर करीब 12 प्रतिशत तक सिमट गया। यानी आधे से ज्यादा किसान इस योजना से दूरी बना चुके हैं।
जानकारों का कहना है कि समस्या सिर्फ बीमा कंपनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई स्तरों पर खामियां हैं। फसल खराब होने पर किसानों को 72 घंटे के भीतर सूचना देनी होती है, लेकिन जागरूकता की कमी के कारण कई किसान तय समय में सूचना नहीं दे पाते, जिससे क्लेम पर आपत्ति लगा दी जाती है। वहीं कृषि विभाग और बीमा कंपनियों की संयुक्त टीम द्वारा किया जाने वाला फसल नुकसान सर्वे भी कई बार समय पर पूरा नहीं होता या रिपोर्ट में तकनीकी खामियां छोड़ दी जाती हैं।
नियम यह भी कहते हैं कि यदि बीमा कंपनी तय समय में भुगतान नहीं करती तो उसे 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ क्लेम राशि देनी होती है, लेकिन व्यवहार में कंपनियां रिपोर्ट में आपत्तियां लगाकर क्लेम को वर्षों तक लटकाए रखती हैं। बैंकों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है, क्योंकि कई मामलों में किसानों का प्रीमियम तो काट लिया गया, लेकिन समय पर बीमा कंपनी के खाते में जमा नहीं कराया गया।
किसान यदि क्लेम नहीं मिलने की शिकायत करते हैं तो जिला स्तर और राज्य स्तर की कमेटियों तक मामला जाता है, लेकिन वहां भी बीमा कंपनियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होने से मामलों का समाधान लंबा खिंच जाता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना, जो कभी किसानों के लिए सुरक्षा की गारंटी मानी जाती थी, आज हरियाणा में भरोसे के संकट से गुजर रही है।













