Asian Games Gockey Gold Medal: एशियन गेम्स के ऐतिहासिक मैदान से भारतीय हॉकी के लिए आई खुशखबरी ने पूरे देश को झूमने पर मजबूर कर दिया है. भारतीय महिला और पुरुष दोनों हॉकी टीमों ने अपने शानदार खेल के दम पर स्वर्ण पदक पर कब्जा जमाकर इतिहास रच दिया. इस ऐतिहासिक जीत के साथ दोनों टीमों ने ओलंपिक के लिए सीधे तौर पर क्वालीफाई भी कर लिया है. देश के करोड़ों खेल प्रेमियों के साथ-साथ हरियाणा के सोनीपत में रहने वाले एक खास हॉकी परिवार के लिए यह क्षण भावुक और गौरवशाली साबित हुआ है. भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान एवं द्रोणाचार्य अवार्डी प्रशिक्षक प्रीतम सिवाच और पूर्व अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी कुलदीप सिवाच के बेटे यशदीप सिवाच इस स्वर्ण पदक विजेता पुरुष टीम के अहम सदस्य हैं. घर की चौखट से निकली हॉकी की सीख जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर सोने में तब्दील हुई, तो पूरे परिवार की खुशी दोगुनी हो गई.
बेटियों के बाद बेटे ने रचा इतिहास, मां और गुरु दोनों के रूप में प्रीतम सिवाच भावुक
भारतीय महिला टीम के स्वर्ण पदक जीतने के ठीक अगले दिन पुरुष टीम ने भी फाइनल में एकतरफा मुकाबला खेलकर 5-1 से शानदार जीत हासिल की और सोने का तमगा अपने नाम किया. दोनों टीमों की इस खिताबी सफलता पर बात करते हुए प्रीतम सिवाच ने कहा कि पूरे देश के लिए यह गर्व का क्षण है. उन्होंने बताया कि पहले बेटियों ने स्वर्ण पदक जीतकर देश का मान बढ़ाया और फिर अगले दिन बेटे यशदीप की टीम ने भी इतिहास दोहरा दिया.
प्रीतम सिवाच ने कहा, ‘कल लड़कियों ने गोल्ड मेडल जीता, जिसकी मुझे बेहद खुशी थी क्योंकि वे मेरी शिष्याएं हैं. आज बेटे की टीम ने सोना जीता है, तो इस खुशी का स्तर अलग ही है. एक गुरु के लिए इससे बड़ा पुरस्कार क्या हो सकता है कि उसका शिष्य आगे बढ़े. यशदीप के मामले में मैं उसकी मां भी हूं और उसकी पहली गुरु भी, इसलिए मेरे लिए यह दोहरी खुशी का मौका है.’
मुकाबले से पहले हुई थी बात, एकजुट होकर खेलोगे तो सोना जरूर मिलेगा
प्रीतम सिवाच ने बताया कि फाइनल मुकाबले से पहले उनकी फोन पर यशदीप से लंबी बातचीत हुई थी. यशदीप ने घर से निकलते समय ही वादा किया था कि टीम सीधे ओलंपिक के लिए क्वालीफाई करेगी और गोल्ड मेडल लेकर लौटेगी. मां के रूप में प्रीतम ने बेटे को सिर्फ एक मूलमंत्र दिया था कि मैदान पर किसी व्यक्तिगत रिकॉर्ड के बजाय पूरी टीम एकजुट होकर खेले, क्योंकि जब टीम का तालमेल मजबूत होता है तो सोना खुद-ब-खुद कदम चूमता है.
मैदान पर पुरुष टीम ने ठीक वैसा ही किया और 5-1 के बड़े अंतर से विरोधी टीम को धूल चटा दी. जीत की सीटी बजते ही सिवाच परिवार में जश्न शुरू हो गया और आसपास के खेल प्रेमियों ने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर इस ऐतिहासिक जीत की बधाई दी.
बचपन में थामी स्टिक और तय किया छह साल का अंतरराष्ट्रीय सफर
यशदीप सिवाच का हॉकी से रिश्ता जन्मजात रहा है. परिवार में माता-पिता दोनों अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी रहे, जिसके चलते घर में दिन-रात केवल हॉकी की ही चर्चा होती थी. दादा-दादी भी खेल की गहरी समझ रखते थे. प्रीतम सिवाच जब मैदान पर युवा लड़कियों को प्रशिक्षण देती थीं, तब नन्हा यशदीप भी उनके साथ मैदान में दौड़ लगाता था. नौवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान यशदीप ने औपचारिक रूप से हॉकी स्टिक थाम ली और अपने जीवन का एकमात्र लक्ष्य भारतीय जर्सी पहनना बना लिया.
अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के दम पर यशदीप का चयन राष्ट्रीय शिविर में हुआ. धीरे-धीरे वह मुख्य टीम में पहुंचे और पिछले करीब छह वर्षों से वह लगातार भारतीय पुरुष हॉकी टीम का हिस्सा बने हुए हैं. विश्व कप के अलावा वह जूनियर एशियन गेम्स और जूनियर विश्व कप जैसी कई बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी भारत का तिरंगा लहरा चुके हैं.
कुलदीप सिवाच बोले- खिलाड़ी के बेटे को खुद को साबित करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ता है
यशदीप के पिता कुलदीप सिवाच, जो खुद भारतीय हॉकी टीम के पूर्व खिलाड़ी और प्रशिक्षक रहे हैं, ने इस खिताबी जीत को पूरे भारतीय खेल जगत के लिए मील का पत्थर बताया. कुलदीप सिवाच ने कहा, “जब आपका अपना बेटा उसी खेल में आगे बढ़ता है जिसमें आप खुद खेले हों, तो उसके ऊपर खुद को बेहतर साबित करने का दबाव और संघर्ष कहीं अधिक बढ़ जाता है. लोगों को लगता है कि राह आसान है, लेकिन हकीकत में उसे खुद को साबित करने के लिए दोगुना पसीना बहाना पड़ता है.”
उन्होंने आगे कहा कि संघर्ष ही खिलाड़ी का जीवन है और बिना कठिन परिश्रम के खेल में कभी बड़े परिणाम नहीं मिलते. संघर्ष का यह दौर लगातार जारी रहना चाहिए ताकि देश में एक मजबूत खेल संस्कृति विकसित हो सके. हरियाणा ने हमेशा की तरह देश के खेल जगत को नई दिशा दी है और यह मेडल उसी खेल परंपरा का फल है.
सोनीपत अब सिर्फ पहलवानी नहीं, हॉकी का भी सबसे बड़ा हब
प्रीतम सिवाच ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि सोनीपत की पहचान अब केवल पहलवानी तक सीमित नहीं रही है. इस एशियन गेम्स की स्वर्ण पदक विजेता पुरुष टीम में अकेले सोनीपत जिले से तीन खिलाड़ी शामिल थे, जबकि महिला टीम में भी अकादमी की चार बेटियां खेल रही थीं. प्रीतम सिवाच ने कहा कि लड़कों की हॉकी का सोनीपत में पहले से ही मजबूत आधार था, और जब उन्होंने अकादमी शुरू की तो बेटियों को भी विश्वस्तरीय प्रशिक्षण मिलना शुरू हुआ.
आने वाले वर्षों में सोनीपत भारतीय हॉकी की रीढ़ साबित होगा. उन्होंने घोषणा की कि पदक जीतकर स्वदेश लौटने पर भारतीय महिला और पुरुष दोनों टीमों के सभी खिलाड़ियों का प्रीतम सिवाच हॉकी अकादमी में ऐतिहासिक और भव्य स्वागत किया जाएगा. पूरे देश को उम्मीद है कि यह टीम आने वाले ओलंपिक खेलों में भी इसी फॉर्म को जारी रखते हुए देश का सिर गर्व से ऊंचा करेगी.












