कारगिल युद्ध का वो वीर युवा सपूत, जिसने 18 साल में लिखी शहादत की कहानी, टाइगर हिल पर गरजा था अंबाला का जवान

On: July 25, 2026 5:19 PM
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अंबाला: 11वीं कक्षा की पढ़ाई शुरू होने वाली थी, घर में भविष्य को लेकर सपने सज रहे थे, लेकिन तभी भारतीय सेना से भर्ती का पत्र आया. दरअसल परिवार और शिक्षकों ने पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी, मगर उस किशोर ने किताबों की जगह फौज की वर्दी चुन ली. उसे सिर्फ एक ही सपना दिखाई देता था, देश सेवा. वही किशोर आगे चलकर कारगिल युद्ध में देश का सबसे कम उम्र का पहला शहीद बना.

बता दें कि यह कहानी है अंबाला जिले की मुलाना विधानसभा के गांव कांसापुर के वीर सपूत शहीद मनजीत सिंह की, जिनकी शहादत 27 साल बाद भी पूरे क्षेत्र के लिए गर्व और प्रेरणा का प्रतीक बनी हुई है. मनजीत सिंह बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखते थे. किसान परिवार में पले-बढ़े मनजीत जब अपनी मां सुरजीत कौर के साथ खेतों में जाते थे, तब भी देश सेवा की बातें किया करते थे. ऐसे में दसवीं कक्षा पास करने के बाद उन्होंने 11वीं में दाखिले की तैयारी की, लेकिन इसी दौरान भारतीय सेना से भर्ती का पत्र आ गया.

18 वर्ष 6 महीने की उम्र में हुए शहीद
उस दौरान शिक्षकों ने परीक्षा देने के बाद जाने की सलाह दी, पर मनजीत के लिए देश सबसे पहले था. उन्होंने बिना देर किए साल 1998 के 8 सिख रेजीमेंट जॉइन कर ली, उस समय उनकी उम्र करीब साढ़े 17 वर्ष थी. ऐसे में ट्रेनिंग पूरी हुए कुछ ही दिन हुए थे और कारगिल युद्ध शुरू हो गया. तब महज 18 वर्ष 6 महीने की उम्र में उनकी तैनाती टाइगर हिल पर कर दी गई थी. दुश्मनों से लोहा लेते हुए मनजीत सिंह मातृभूमि की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए.

परिवार को बेटे की शहादत पर गर्व
इस बारे में लोकल 18 से बातचीत में शहीद के पिता गुरचरण सिंह बताते हैं कि मनजीत सिंह बचपन से ही कहते थे, ‘जो गोली मेरे लिए बनी है, वह मुझे ही लगेगी और मैं देश के लिए शहीद होऊंगा’. पिता कहते हैं कि उस समय शायद किसी ने इन शब्दों पर ध्यान नहीं दिया था, लेकिन कारगिल युद्ध में बेटे की शहादत के बाद यही शब्द परिवार की सबसे बड़ी याद बन गए हैं. उन्हें अपने बेटे के बलिदान पर गर्व महसूस है.

उनका कहना है कि आज भी गांव के कई युवा सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहे हैं और मनजीत की शहादत उन्हें प्रेरणा देती है. उन्होंने बताया है कि उनके बेटे शहीद मनजीत सिंह बहुत ही कम उम्र में देश के पहले शहीद कारगिल युद्ध में हुए थे और अब कुछ समय पहले उन्हें सेना की ओर से कारगिल बुलाया गया है, लेकिन उम्र ज्यादा होने की वजह से वह कारगिल नहीं जा पाए हैं.

शहीद के नाम खुला सरकारी प्राथमिक विद्यालय
शहीद की माता सुरजीत कौर बताती हैं कि मनजीत बचपन से ही देश सेवा की बात किया करते थे. उस दौरान जब वह उनके साथ खेतों में काम करने के लिए जाया करते थे, तब भी वह देश सेवा की बातें किया करते थे. उन्होंने कहा कि आज जब गांव के बच्चे और युवा उनके बारे में सुनते हैं तो उनके भीतर भी सेना में जाने का जज्बा पैदा होता है.

उन्होंने बताया कि मनजीत सिंह की शहादत सिर्फ परिवार की यादों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांव के मुख्य द्वार पर उनका नाम दर्ज है. सरकारी प्राथमिक विद्यालय का नाम उनके नाम पर रखा गया था और सरकार ने उनके परिवार को शहीद के नाम पर गैस एजेंसी भी अलॉट करवाई थी. ऐसे में अब हर साल 15 अगस्त, 26 जनवरी और 26 जुलाई को पूरा गांव एकजुट होकर अपने वीर सपूत को श्रद्धांजलि देता है.

शहीद मनजीत सिंह की प्रतिमा की मांग
वहीं राष्ट्रीय जागरण मंच के संस्थापक अमरेंद्र सिंह बताते हैं कि शहादत के 27 वर्ष बाद भी क्षेत्र के लोगों के दिलों में मनजीत सिंह पहले जैसी ही जगह रखते हैं. उनका मानना है कि यदि गांव में शहीद की भव्य प्रतिमा स्थापित की जाए तो आने वाली पीढ़ियां उनके अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति से प्रेरणा लेकर देश सेवा का संकल्प लेंगी. इसलिए सरकार से मांग करते हैं कि क्षेत्र में शहीद मनजीत सिंह की एक प्रतिमा भी लगाई जाए.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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