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Faridabad News: फरीदाबाद के अमृता अस्पताल में इलेक्ट्रिक बग्घी चलाने वाली महिलाएं सिर्फ मरीजों की मदद ही नहीं कर रहीं, बल्कि अपने परिवार की सबसे बड़ी ताकत भी बन चुकी हैं. किसी ने मां के इलाज के लिए पढ़ाई छोड़ दी, कोई बुजुर्ग पिता का सहारा बनी, तो कोई अपने बच्चों का भविष्य संवार रही है.
फरीदाबाद: अक्सर कहा जाता है कि बेटियां किसी भी मायने में बेटों से कम नहीं होतीं. यह बात अब सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि कई परिवारों की सच्चाई बन चुकी है. जहां कभी बेटियों को घर की चौखट तक सीमित माना जाता था, वहीं आज वही बेटियां घर की सबसे बड़ी ताकत बनकर सामने आ रही हैं. कोई 20 साल की उम्र में मां के इलाज के लिए नौकरी कर रही है, कोई पिता की बढ़ती उम्र का सहारा बनी हुई है, तो कोई अपने छोटे बच्चों की पढ़ाई और घर का खर्च अपने दम पर चला रही है. इनकी जिंदगी आसान नहीं रही. किसी की पढ़ाई नौवीं के बाद छूट गई, तो किसी ने मजबूरियों के चलते कम उम्र में ही जिम्मेदारियां अपने कंधों पर उठा लीं, लेकिन इन बेटियों ने हार नहीं मानी.
वहीं आज हम ऐसी ही महिलाओं के बारे में बात करेंगे, जो इलेक्ट्रिक बग्घी चलाकर मरीजों और उनके परिजनों की मदद कर रही हैं. यह सेवा पूरी तरह निशुल्क है. मरीजों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता, बल्कि इन महिलाओं को वेतन अस्पताल की ओर से दिया जाता है. नौकरी शुरू करने से पहले इन्हें निशुल्क ट्रेनिंग दी गई और ट्रेनिंग पूरी होने के बाद आज ये आत्मविश्वास के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं. फरीदाबाद अमृता अस्पताल में शुरू हुई यह पहल कई महिलाओं के लिए आत्मनिर्भर बनने का जरिया बन गई है.
खुशी ने क्यों चुनी नौकरी?
Local18 से बातचीत में खुशी बताती हैं कि उन्हें यहां काम करते हुए करीब एक साल हो गया है. पिछले एक साल से वो इलेक्ट्रिक बग्घी चला रही हैं. उनकी उम्र अभी सिर्फ 20 साल है, लेकिन इतनी छोटी उम्र में ही उन्हें घर की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी. उन्होंने सिर्फ नौवीं तक पढ़ाई की. घर की आर्थिक मजबूरियों की वजह से पढ़ाई छोड़नी पड़ी.
उन्होंने कहा, ‘मैं उत्तर प्रदेश की रहने वाली हूं. मेरे पापा बस चलाते हैं, लेकिन उनकी कमाई इतनी नहीं थी कि घर और मम्मी के इलाज का खर्च चल सके. मम्मी की तबीयत लगातार खराब रहने लगी तो खर्च भी बढ़ गया. भाई भी नौकरी करता है, लेकिन उसकी आमदनी भी सीमित है. ऐसे में मुझे घर से निकलकर काम करना पड़ा. मैं सुबह 8 बजे ड्यूटी पर आती हूं और शाम 6 बजे तक काम करती हूं. यहां से मिलने वाली 13 हजार रुपये की सैलरी से मैं घर का खर्च चलाने में मदद करती हूं.’
मौसी के यहां रहकर काम कर रहीं आरती
आरती बताती हैं, ‘मैं पिछले पांच महीने से यहां बग्घी चला रही हूं. मैं भी उत्तर प्रदेश की रहने वाली हूं, लेकिन फिलहाल फरीदाबाद में अपनी मौसी के साथ रहती हूं. मेरे मम्मी-पापा गांव में रहते हैं. मैं घर में सबसे छोटी हूं, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी जल्दी संभालनी पड़ी. मैंने भी नौवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी, क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी. पापा की उम्र ज्यादा हो गई है और अब उनसे पहले की तरह काम नहीं हो पाता. भाई की शादी हो चुकी है और वह अपनी जिम्मेदारियों में व्यस्त है. ऐसे में मैंने नौकरी शुरू की, ताकि मम्मी-पापा का सहारा बन सकूं. अब जो भी कमाती हूं, उससे घर का खर्च चलाने में मदद करती हूं और यही मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी है.
घर का पूरा खर्च उठा रहीं कविता
कविता बताती हैं कि मैं पिछले दो साल से यहां काम कर रही हूं. मैं फरीदाबाद के खेड़ी गांव की रहने वाली हूं. मेरे परिवार में मेरी सास, मेरे दो बच्चे और मैं हूं. घर का पूरा खर्च मैं ही उठाती हूं. इससे पहले मैंने कभी कोई नौकरी नहीं की थी, लेकिन काम मिलने के बाद जिंदगी बदल गई. मेरी ड्यूटी करीब 10 घंटे की होती है. ड्यूटी खत्म होने के बाद घर जाकर खाना बनाना और बाकी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं. मेरी सास पूरे दिन बच्चों का ध्यान रखती हैं. मेरी बेटी 14 साल की है और बेटा 8 साल का है. दोनों अच्छी तरह पढ़ाई कर रहे हैं. मेरी उम्र 33 साल है और अब मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने बच्चों का भविष्य अपने दम पर संवारने की कोशिश कर रही हूं.
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आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…
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