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Raksha Bandhan 2026 : अंबाला के हीरा नगर निवासी मनोज की जिंदगी उनकी बहन की एक सलाह ने हमेशा के लिए बदल दी. नौकरी करने वाले मनोज के मन में लंबे समय से अपना काम शुरू करने का सपना था, लेकिन इस सपने को हकीकत में बदलने का आइडिया उन्हें अपनी मुंहबोली बहन से मिला. रक्षाबंधन के मौके पर मनोज की कहानी भाई-बहन के रिश्ते का एक अलग पहलू सामने लाती है. मनोज का बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच गुजरा. उनके पिता रिक्शा चलाते थे. लोकल 18 से मनोज कहते हैं कि उन्होंने करीब 25 साल तक अलग-अलग निजी कंपनियों में नौकरी की है. अब उनकी मॉडिफाई बाइक अंबाला की गलियों, बाजारों, दफ्तरों और कॉलोनियों में मनोज की पहचान बन चुकी है.
अंबाला. रक्षाबंधन सिर्फ कलाई पर राखी बांधने और भाई की लंबी उम्र की कामना करने का त्योहार नहीं है. भाई-बहन का रिश्ता कई बार जिंदगी के ऐसे मोड़ पर भी साथ खड़ा होता है, जहां एक छोटी-सी सलाह किसी की पूरी जिंदगी की दिशा बदल देती है. अंबाला के हीरा नगर निवासी मनोज की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बड़ी कंपनियों में नौकरी करने वाले मनोज के मन में लंबे समय से अपना काम शुरू करने का सपना था, लेकिन इस सपने को हकीकत में बदलने का आइडिया उन्हें अपनी मुंहबोली बहन से मिला. उनकी बहन ने सलाह दी कि दूसरों के लिए नौकरी करने के बजाय घर का बना खाना तैयार कर अपना काम शुरू किया जाए. आज यही सलाह मनोज की अलग पहचान बन चुकी है.
चलती-फिरती रसोई
मनोज का बचपन आर्थिक चुनौतियों के बीच गुजरा. उनके पिता रिक्शा चलाकर परिवार का खर्च उठाते थे. मेहनत और संघर्ष के बीच मनोज ने पढ़ाई पूरी की और मास्टर डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने करीब 25 साल तक अलग-अलग निजी कंपनियों में नौकरी की. माइक्रोसॉफ्ट, नोकिया और डैश मोबाइल जैसी कंपनियों में काम कर चुके मनोज को नौकरी के दौरान करीब 32 से 35 हजार रुपये वेतन मिलता था, जो इंसेंटिव के साथ लगभग 40 हजार रुपये तक पहुंच जाता था. अच्छी नौकरी होने के बावजूद मनोज के मन में अपना काम करने की इच्छा लगातार बनी रही. इसी दौरान उनकी मुंहबोली बहन ने उन्हें घर का बना शुद्ध और स्वादिष्ट खाना बेचने का सुझाव दिया. विचार पसंद आया तो मनोज ने इसे आजमाने का फैसला किया, शुरुआत में उन्होंने साइकिल पर खाना बेचने की सोची, लेकिन बाद में शाहाबाद के एक कारीगर से करीब 15 हजार रुपये खर्च कर अपनी बाइक को ही मॉडिफाई करवाया और बाइक पर ऐसा सेटअप तैयार किया गया कि वह एक छोटी-सी चलती-फिरती रसोई बन गई.
10 से 200 रोटियों तक
अब यही बाइक अंबाला की गलियों, बाजारों, दफ्तरों और कॉलोनियों में मनोज की पहचान बन चुकी है. वह रोजाना अलग-अलग जगह पहुंचकर लोगों को घर जैसा खाना उपलब्ध कराते हैं. मेन्यू में शाही पनीर, कढ़ाई पनीर, कढ़ी-चावल, राजमा-चावल, दाल, छोले और रोटी-सब्जी जैसे व्यंजन शामिल रहते हैं. आम लोगों की जेब का ध्यान रखते हुए खाने की शुरुआत 30 रुपये से होती है, जबकि फुल प्लेट करीब 50 रुपये और पनीर वाली स्पेशल थाली 90 रुपये में मिलती है. मनोज इस सफर में अकेले नहीं हैं. उनकी पत्नी भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं. दोनों सुबह से खाना तैयार करने में जुट जाते हैं. शुरुआत में जहां सिर्फ 10 रोटियां बनती थीं, वहीं अब रोजाना करीब 200 रोटियां तैयार होती हैं और लगभग 100 प्लेट खाना बिकता है. इसके अलावा वह कंपनियों में टिफिन सेवा भी देते हैं और चायपत्ती की डीलरशिप लेकर अतिरिक्त काम भी कर रहे हैं.
दोस्तों ने बना ली दूरी
लोकल 18 से मनोज बताते हैं कि शुरुआत में कई लोगों ने उनके काम का मजाक उड़ाया. कुछ दोस्तों ने दूरी भी बना ली, लेकिन उन्होंने किसी की बात की परवाह नहीं की. उन्होंने बहन की सलाह और अपने सपने पर भरोसा रखा. आज वही फैसला उनकी पहचान बन चुका है. मनोज कहते हैं कि वह रोजाना खाने का मेन्यू चेंज करते हैं और शाही पनीर से लेकर कड़ी चावल, राजमा-चावल और रोटी-सब्जी खाने के लिए दी जाती है. चावल और छोले, दाल और राजमा का दोना 30 रुपये में देते हैं. फुल प्लेट 50 रुपये की है. इसमें सब्जी रोटी, कढ़ी चावल के साथ सलाद दिया जाता है. शाही पनीर और कढ़ाई-पनीर यह थाली की कीमत 90 रुपये है. वह रोजाना 100 फ्लेट बेचते हैं. वह कहते हैं कि पत्नी के साथ मिलकर अंगीठी पर खाना बनाते हैं. रक्षाबंधन के मौके पर मनोज की कहानी भाई-बहन के रिश्ते का एक अलग पहलू सामने लाती है. यहां बहन ने भाई की कलाई पर सिर्फ राखी नहीं बांधी, बल्कि उसे अपने पैरों पर खड़ा होने का रास्ता भी दिखाया.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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