9 साल की उम्र में मिला वो दर्द और 23 साल से न्याय का इंतजार, बिन टांगों-एक हाथ के एवरेस्ट बेस कैंप तक चढ़ाई करने वाले टिंकेश कौशिक की कहानी

On: October 6, 2026 12:48 PM
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झज्जर. ये कहानी उस युवक की है, जिसकी दोनों टांगें और एक हाथ नहीं हैं. फिर भी उसने जिंदगी में हार नहीं मानी और माउट एवरेस्ट के बैस कैंप तक की यात्रा की. ऐसा करने वाले वह दुनिया के पहले शख्स हैं. हालांकि. अब भी वह 23 साल से न्याय का इंतजार कर रहे हैं. युवक टिंकेश कौशिक का दर्द अब छलका है, जो कि बिजली विभाग की लापरवाही का खामियाजा अब भुगत रहे हैं.

दरअसल, यह घटना हरियाणा के झज्जर से शुरू होती है. टिंकेश कोशिक ने सोशल मीडिया पर लिखा कि 23 साल बाद भी मैं न्याय की तलाश में हूं. 29 दिसंबर 2002 वो दिन, जब मेरी जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई.

टिंकेश लिखते हैं कि मैं सिर्फ 9 साल का था, जब हरियाणा के झज्जर में मुझे 11,000 वोल्ट की बिलजी लाइन से झटका लगा. इस हादसे ने मुझे ऐसी स्थायी और जीवन बदल देने वाली दिव्यांगता दी, जिसका असर आज भी मेरी जिंदगी पर है.

फेसबुक पर अपना दर्द बयां करते हुए टिंकेश लिखते हैं कि इस हादसे के बाज इलाज, लगातार मेडिकल जरूरतें, पुनर्वास, दूसरों पर निर्भरता और रोजमर्रा की जिंदगी में अनगिनत चुनौतियों का लंबा सफर अब भी जारी है.मेरे परिवार ने न्याय के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था और उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम को जिम्मेदार ठहराया गया और 2 लाख रुपये मुआवजा देने पर सहमति बनी थी. बाद में हमारी अपील के बाद यह राशि बढ़ाकर 5 लाख रुपये की गई, जबकि 8 लाख रुपये की मांग को भी स्वीकार नहीं किया गया.  लेकिन सवाल सिर्फ उस रकम का नहीं है. 23 साल बीत चुके हैं और आज भी मैं न्याय का इंतजार कर रहा हूं.


टिंकेश कहते हैं कि मेरे कृत्रिम अंगों की एक बार की फिटमेंट का खर्च ही इस मुआवजे से कहीं ज्यादा है. कृत्रिम अंगों को हर 3 साल में बदलने की जरूरत पड़ती है. इसके अलावा हर साल कृत्रिम अंगों के मैंटेनेंस, मेडिकल खर्च और दिव्यांगता से जुड़े दूसरे खर्च अलग हैं. आज इतने वर्षों बाद भी मैं यह सवाल उठा रहा हूं कि आखिर एक बच्चे को हुई स्थायी दिव्यांगता के लिए ‘मुआवजा’ वास्तव में कितना और किस आधार पर होना चाहिए?

टिंकेश कहते हैं कि यह सिर्फ किसी एक रकम की बात नहीं है और यह बात है बचपन में हुई स्थायी दिव्यांगता के पूरी जिंदगी पर पड़ने वाले असर की. शिक्षा, रोजगार और कमाई के अवसरों के नुकसान की. दूसरों पर निर्भरता और अन्य अतिरिक्त खर्चों की. मैं सिर्फ एक निष्पक्ष सुनवाई चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि मेरी जिंदगी पर पड़े इन 23 वर्षों के असर को समझा जाए और मुआवजे पर न्यायपूर्ण और उचित विचार किया जाए.

वकीलों से मदद की अपील

टिंकेश ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर आप वकील, दिव्यांगों के अधिकारों के वकालत करने वाले या फिर पत्रकार तो मेरी मदद करें और मुझे गाइड करें. दो दशक से ज्यादा समय बीत चुका है. फिर भी मेरा न्याय व्यवस्था पर भरोसा कायम है. मैं न्याय मांग रहा हूं. मैं सिर्फ वही मांग रहा हूं, जो उचित और न्यायपूर्ण हो.


उस दिन हुआ क्या था

टिंकेश कौशिक एक और पोस्ट में लिखते हैं कि मुझे याद है कि हादसे वाले दिन में पतंग उड़ा रहा था. मेरे घर की छत से दो फीट की ऊंचाई पर हाईवोल्टेज तारें जा रही थी. इस दौरान वह इन तारों की चपेट में आ गए और मैं मदद के लिए चिल्ला रहा था, लेकिन किसी ने मेरी आवाज नहीं सुनी. मुझे याद है कि बाद में कोई मुझे कार में अस्पताल ले गए थे और दो फिर जब मुझे होश आया तो बेहद दर्द हो रहा था. मुझे अब भी याद है वो दिन, जब मुझे एहसास हुआ कि मैंने अपने दोनों हाथ खो दिए हैं. अब टिंकेश मोटिवेशनल स्पीकर हैं और लोगों की हौंसलाअफजाई करते हैं.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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