Haryana News: हरियाणा में भिवानी जिले के नकीपुर में प्रसव के बाद नवजात शिशु की मौत के मामले में हरियाणा मानवाधिकार आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने इस मामले में संबंधित स्टाफ नर्स के खिलाफ नियमित विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की है। इसके अलावा, परिजनों को मुआवजा देने और दर्ज प्राथमिकी की तेजी से जांच करने के निर्देश दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 12 जनवरी, 2027 को होगी।
आयोग ने खामियों पर जताई चिंता
जस्टिस ललित बत्रा की अध्यक्षता वाली आयोग की पूर्ण पीठ ने शिकायत की सुनवाई के दौरान ये निर्देश दिए। पीठ में सदस्य (न्यायिक) कुलदीप जैन और सदस्य दीप भाटिया शामिल हैं। आयोग ने जिला चिकित्सा लापरवाही बोर्ड, भिवानी की जांच रिपोर्ट में निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल के कथित उल्लंघन से जुड़ी कमियों पर गंभीर चिंता जताई।
क्या है मामला?
सिविल अस्पताल, भिवानी स्थित जिला चिकित्सा लापरवाही बोर्ड के सदस्य सचिव-सह-मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने 16 जून, 2026 को जांच रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। रिपोर्ट के अनुसार, नकीपुर पीएचसी में प्रसव के समय कोई चिकित्सक मौजूद नहीं था। स्टाफ नर्स ने अन्य कर्मचारियों की सहायता से प्रसव करवाया। बोर्ड ने पाया कि गर्भावस्था उच्च जोखिम वाली होने के बावजूद निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया गया। ऐसी स्थिति में चिकित्सक की उपस्थिति और आवश्यक चिकित्सा सहायता सुनिश्चित की जानी चाहिए थी।
टीकाकरण में समय किया बर्बाद
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, नवजात को बाद में भिवानी की विशेष नवजात देखभाल इकाई (एसएनसीयू) लाया गया, जहां उसे मृत अवस्था में लाया गया घोषित किया गया। बोर्ड ने कहा कि नवजात को तत्काल पुनर्जीवन संबंधी चिकित्सा उपायों की जरूरत थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस गंभीर स्थिति के दौरान संबंधित स्टाफ नर्स द्वारा टीकाकरण किए जाने में बहुमूल्य समय व्यर्थ हुआ। आयोग ने कहा कि उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था के मामले में चिकित्सक की अनुपस्थिति और निर्धारित चिकित्सा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किए जाने से नवजात के जीवन के अधिकार तथा सरकारी स्वास्थ्य संस्थान में उचित चिकित्सा देखभाल पाने के अधिकार को लेकर गंभीर सवाल उठते हैं।
मुआवजे पर विचार देने को कहा
आयोग ने स्पष्ट किया कि इतनी गंभीर घटना के मामले में केवल विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। नवजात की मौत से परिवार को हुई अपूरणीय क्षति को देखते हुए आर्थिक मुआवजे पर भी विचार किया जाना चाहिए। अधिकारियों को मुआवजे पर विचार करते समय जांच बोर्ड के निष्कर्षों, सरकारी कर्मचारियों के कर्तव्यों के निर्वहन में सामने आई कमियों और राज्य की जिम्मेदारी जैसे पहलुओं को ध्यान में रखने को कहा गया है।












