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Faridabad ki local news : दिवाली पर गाय के गोबर से बने दीये, धूपबत्ती और हवन सामग्री की मांग बढ़ गई है. फरीदाबाद के लढ़ौली गांव की गौशाला में हाथ से चलने वाली मशीनों से प्रोडक्ट बनाए जा रहे हैं. ऑर्डर दिल्ली तक से मिल रहे हैं. गौशाला में काम करने वाले जगत लोकल 18 से बताते हैं कि यहां गाय के गोबर से अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं. यहां धूपबत्ती, दीये और हवन सामग्री जैसे सामान बनाए जाते हैं. गौशाला में गाय का घी भी तैयार किया जाता है. इन सभी प्रोडक्ट को बनाने का काम गौशाला में ही किया जाता है. 40 से 50 हजार रुपये में मशीनें और जरूरी सामान लेकर यह काम शुरू किया जा सकता है. सामान को आसपास के बाजारों में भी बेचा जा सकता है.
फरीदाबाद. दिवाली पर घरों में दीये जलाने और पूजा करने की परंपरा सदियों पुरानी है. दिवाली करीब आते ही बाजार में गाय के गोबर से बने दीये, धूपबत्ती और हवन सामग्री की मांग भी बढ़ जाती है. फरीदाबाद के लढ़ौली गांव की एक गौशाला में गाय के गोबर से कई तरह के प्रोडक्ट तैयार किए जा रहे हैं. इन प्रोडक्ट को बनाने के लिए बिजली से चलने वाली मशीनों का इस्तेमाल नहीं होता. यहां हाथ से चलने वाली मशीनों की मदद से सामान तैयार किया जाता है. इस काम से गौशाला में चार से पांच लोगों को रोजगार भी मिला हुआ है. गौशाला में काम करने वाले जगत लोकल 18 से बताते हैं कि मैं पिछले तीन साल से यहां काम कर रहा हूं. गाय के गोबर से अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट तैयार किए जाते हैं. दिवाली के समय इनकी मांग बढ़ जाती है. दिल्ली तक से ऑर्डर आते हैं. जगत बताते हैं कि यहां धूपबत्ती, दीये और हवन सामग्री जैसे सामान बनाए जाते हैं. गौशाला में गाय का घी भी तैयार किया जाता है. इन सभी प्रोडक्ट को बनाने का काम गौशाला में ही किया जाता है.
जगत बताते हैं कि यहां प्रोडक्ट बनाने के लिए अलग-अलग तरह की मशीनें और सांचे रखे हुए हैं. सबसे अच्छी बात यह है कि इन मशीनों को चलाने के लिए बिजली की जरूरत नहीं पड़ती. इन्हें हाथ से चलाया जाता है. इससे बिजली का खर्च बचता है और काम करने में भी ज्यादा परेशानी नहीं होती. जगत के मुताबिक, इस काम को शुरू करने के लिए ज्यादा पैसे लगाने की जरूरत नहीं है. करीब 40 से 50 हजार रुपये में मशीनें और जरूरी सामान लेकर यह काम शुरू किया जा सकता है. फरीदाबाद के कई गांवों में बड़ी संख्या में लोग पशुपालन करते हैं. उन परिवारों के पास 50 से 60 तक गाय हैं. ऐसे में रोजाना काफी मात्रा में गोबर निकलता है. लोग इस गोबर को बेकार समझकर छोड़ देते हैं, जबकि इससे धूपबत्ती, दीये और हवन सामग्री जैसे प्रोडक्ट तैयार किए जा सकते हैं. अगर पशुपालक अपने घरों में छोटी मशीनें लगाकर यह काम शुरू करें तो उन्हें गोबर से कमाई करने का मौका मिल सकता है. तैयार सामान को आसपास के बाजारों में बेचकर रोजगार भी शुरू किया जा सकता है.
सड़कों पर छोड़ देते हैं
जगत बताते हैं कि इस गौशाला में फिलहाल 8 से 9 गाय हैं. इनमें ऐसी गाय भी हैं, जो घायल अवस्था में यहां लाई जाती हैं. कई लोग गाय के दूध देना बंद करने के बाद उन्हें सड़कों पर छोड़ देते हैं. ऐसी गाय सड़क पर घूमते समय हादसे का शिकार हो जाती हैं. गौशाला में इन बेसहारा और घायल गायों को रखा जाता है और उनका इलाज किया जाता है. यहां गायों के खाने-पीने का भी इंतजाम किया गया है. जगत बताते हैं कि गौशाला में गायों की सेवा के साथ उनके गोबर से प्रोडक्ट बनाकर लोगों को रोजगार देने का काम भी किया जा रहा है.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…











