दादा लखमी चंद: हरियाणा के सूर्य-कवि की संपूर्ण जीवनी और साहित्यिक योगदान

On: November 17, 2025 2:21 PM
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लखमी चंद
पंडित लखमी चंद, जिन्हें सम्मानपूर्वक “दादा लखमी चंद” के नाम से जाना जाता है, हरियाणवी साहित्य और लोक कला के इतिहास में एक अद्वितीय स्थान रखते हैं। 1903 से 1945 तक के अपने संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली जीवनकाल में, उन्होंने हरियाणवी रागनी और सांग परंपरा को ऐसी ऊंचाइयों पर पहुंचाया जो आज भी अतुलनीय है। उन्हें “सूर्य-कवि” (सूर्य के समान तेजस्वी कवि), “हरियाणा का कालिदास”, और “हरियाणा का शेक्सपियर” जैसे उपाधियों से विभूषित किया गया है।
प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

जन्म और बचपन

पंडित लखमी चंद का जन्म 15 जुलाई 1903 को सोनीपत जिले के जाटी कलां (जांटी कलां) गांव में एक साधारण किसान गौड़ ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम पंडित उदमीराम और माता का नाम शिबिया देवी था। यह गांव यमुना नदी के तट के निकट स्थित था, हालांकि 1900 के दशक के प्रारंभ में नदी गांव के बहुत करीब बहती थी, लेकिन अब वह कई किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की ओर स्थानांतरित हो चुकी है। लखमी चंद अपने माता-पिता की दूसरी संतान थे, और उनके परिवार में दो भाई और तीन बहनें थीं।​

परिवार की आर्थिक स्थिति अत्यंत कमजोर थी। गरीबी और शिक्षा संसाधनों के अभाव के कारण, बालक लखमी चंद को कभी औपचारिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। इसके बजाय, उन्हें मात्र सात-आठ वर्ष की आयु में ही पशु चराने के लिए खेतों में भेजा जाने लगा। लेकिन यह अशिक्षित बालक ज्ञान के मामले में आगे चलकर शिक्षित लोगों को भी मात देने वाला बना।​

संगीत के प्रति प्रारंभिक रुझान

बाल्यावस्था में ही लखमी चंद की संगीत और गायन में गहरी रुचि थी। खेतों में पशु चराते हुए, वे हमेशा कुछ न कुछ गुनगुनाते रहते थे। मात्र सात-आठ वर्ष की आयु में उनकी मधुर और सुरीली आवाज ने ग्रामीणों का मन मोह लिया। लोग उनसे नित्य गीत और भजन सुनाने का आग्रह करने लगे। ग्रामीणों की अपार प्रशंसा से उत्साहित होकर, बालक लखमी चंद ने अनेक गीत और भजन कंठस्थ कर लिए और गायकी के मार्ग पर तेजी से कदम बढ़ाने लगे।​

गुरु-शिष्य परंपरा और प्रशिक्षण

पंडित मान सिंह से मुलाकात

लखमी चंद के जीवन में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब उनके गांव जांटी कलां में एक विवाह समारोह के दौरान बासौदी (बसौदी) गांव निवासी पंडित मान सिंह भजन-रागनी का कार्यक्रम करने के लिए पहुंचे। पंडित मान सिंह जन्म से नेत्रहीन (अंधे) थे, लेकिन संगीत और रागनी के महान कलाकार थे। उन्होंने कई दिनों तक गांव में भजन और रागनियां सुनाईं। बालक लखमी चंद प्रतिदिन उनके भजन सुनने के लिए जाते थे।​

पंडित मान सिंह के संगीत ने लखमी चंद के हृदय पर ऐसा जादू किया कि उन्होंने सीधे मान सिंह जी को अपना गुरु बनाने का निवेदन कर डाला। एक बालक के गायकी के प्रति इस अपार लगाव से प्रभावित होकर, पंडित मान सिंह ने उनके पिता पंडित उदमी राम से इस बारे में बात की और उनकी सहमति के बाद बालक लखमी चंद को अपना शिष्य बनाना स्वीकार कर लिया। इस गुरु-शिष्य संबंध ने लखमी चंद के जीवन की दिशा पूरी तरह बदल दी।​

सांग कला की शिक्षा

कुछ ही समय में, लखमी चंद की गायन प्रतिभा और सुरीली आवाज ने लोगों को अपना दीवाना बना लिया। अब उनकी रुचि केवल रागनी तक सीमित नहीं रही; उन्होंने ‘सांग’ (हरियाणवी लोक नाट्य) की कला सीखने का निर्णय लिया। सांग की कला सीखने के लिए, लखमी चंद कुण्डल गांव निवासी सोहन लाल के बेड़े (नाट्य मंडली) में शामिल हो गए।​

अडिग लगन और मेहनत के बल पर, मात्र पांच वर्षों में ही उन्होंने सांग की बारीकियां सीख लीं। उनके अभिनय, नृत्य, अंग-अंग का मटकना, मनोहारी अदाएं, हाथों की मुद्राएं, कमर की लचक और गजब की फूर्ती का जादू हर किसी को मदहोश कर देता था।​

संघर्ष और विषाक्तता की घटना

ईर्ष्यालु कलाकारों द्वारा विषाक्त भोजन

लखमी चंद की बढ़ती लोकप्रियता और अद्वितीय प्रतिभा ने कुछ संकीर्ण मानसिकता के कलाकारों में ईर्ष्या पैदा कर दी। जैसा कि स्रोतों में उल्लेख है, उन्हें “बहु-आयामी प्रतिभाशाली” व्यक्ति के रूप में वर्णित किया गया है – वे अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, गायक और रचनाकार थे। अन्य गायक और सांगी उनसे इतने ईर्ष्या करते थे कि एक दिन कुछ लोगों ने धोखे से लखमी चंद के खाने में पारा (mercury) मिला दिया।​

इस विषाक्त भोजन के सेवन से लखमी चंद का स्वास्थ्य गंभीर रूप से खराब हो गया। उनकी सबसे बड़ी पूंजी – उनकी सुरीली आवाज – को भारी क्षति पहुंची। लेकिन महान कलाकार ने हार नहीं मानी। सतत साधना और कठिन परिश्रम के माध्यम से, लखमी चंद ने कुछ समय बाद पुनः अपनी आवाज में सुधार किया। इस घटना के बाद, उन्होंने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया – अपना स्वतंत्र बेड़ा (नाट्य मंडली) तैयार करने का।​

स्वतंत्र कलाकार के रूप में स्थापना

अपना बेड़ा गठन

पंडित लखमी चंद ने अपने गुरुभाई जैलाल नदीपुर माजरावाले के साथ मिलकर मात्र 18-19 वर्ष की उम्र में ही अलग बेड़ा बनाया और स्वतंत्र रूप से सांग मंचित करने लगे। अपनी बहुमुखी प्रतिभा और महान दृढ़ संकल्प के बल पर, उन्होंने एक वर्ष के अंदर ही लोगों के बीच पुनः अपनी मजबूत पकड़ बना ली।​

उनकी लोकप्रियता को देखते हुए, बड़े-बड़े धुरंधर कलाकार उनके बेड़े में शामिल होने लगे। देखते ही देखते, पंडित लखमी चंद ‘सांग-सम्राट’ के रूप में विख्यात हो गए। सांग के दौरान साज-आवाज-अंदाज आदि किसी भी मामले में किसी तरह की ढील या लापरवाही उन्हें बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। उन्होंने अपने बेड़े में एक से बढ़कर एक कलाकार रखे और सांग कला को नई ऐतिहासिक ऊंचाइयों पर पहुंचाया।​

जीवन यात्रा: पंडित लखमी चंद का कालक्रम (1903-1945) | Life Journey Timeline of Pandit Lakhmi Chand
जीवन यात्रा: पंडित लखमी चंद का कालक्रम (1903-1945) | Life Journey Timeline of Pandit Lakhmi Chand

व्यापक लोकप्रियता

20वीं सदी के शुरुआती और मध्य दशकों में, हरियाणा के गांव-गांव में लखमी चंद का नाम गूंजने लगा। लोग 50-60 मील दूर से बैलगाड़ियों में सवार होकर उनकी रागनियां सुनने और सांग देखने आते थे। उनके प्रदर्शनों में हजारों की भीड़ जुटती थी। उनकी रचनाओं में नैतिक संदेश, आध्यात्मिक ज्ञान और सामाजिक मूल्यों का अद्भुत संगम था।​

साहित्यिक रचनाएं और सांग

प्रमुख सांग (लोक नाट्य)

पंडित लखमी चंद ने अपने जीवनकाल में लगभग दो दर्जन (20-24) सांगों की रचना की। ये सांग पौराणिक कथाओं, ऐतिहासिक घटनाओं, नैतिक शिक्षाओं और रोमांटिक कहानियों पर आधारित थे। उनके सबसे प्रसिद्ध सांगों में शामिल हैं:​

पौराणिक और धार्मिक सांग:

  • राजा हरिश्चंद्र – सत्य और त्याग की कहानी, जो आज भी अत्यंत लोकप्रिय है​

  • सत्यवान सावित्री – पति-भक्ति और समर्पण की महागाथा​

  • नल-दमयंती – प्रेम और वफादारी का प्रतीक​

  • मीराबाई – भक्ति और समर्पण की कहानी​

  • राजा गोपीचंद – त्याग और वैराग्य​

  • द्रौपदी चीर हरण और कीचक द्रौपदी – महाभारत से प्रेरित​

  • भगत पूरनमल / पूरन भगत – भक्ति कथा​

नैतिक और सामाजिक सांग:

  • सेठ ताराचंद – धर्म, दान और पुण्य का महत्व​​

  • शाही लकड़हारा (शाही लकड़हारा) – साधारण लकड़हारे की कहानी जो धर्म और सेवा के माध्यम से उन्नति करता है​

  • ज्यानी चोर – नैतिकता और सुधार की कथा​

रोमांटिक और पंजाबी लोक कथाएं:

  • हीर रांझा – पंजाबी रोमांस की अमर कहानी​

  • पद्मावत – रानी पद्मावती की गाथा​

अन्य महत्वपूर्ण सांग:

  • चापसिंह सोमवती / सरदार चापसिंह – ऐतिहासिक वीरता​

  • भूप पूरनजन – पौराणिक कथा​

  • हीरामल जमाल, रघुबीर धरमकौर, चांदरकिरन – विभिन्न लोक कथाएं​

  • नौटंकी – मनोरंजन केंद्रित​

ब्रह्मज्ञान और आध्यात्मिक रचनाएं

प्रारंभ में, लखमी चंद श्रृंगार-रस (रोमांटिक) की रचनाओं पर अधिक ध्यान देते थे, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान को भी अपनी रचनाओं में पिरोना शुरू कर दिया। वेदों, शास्त्रों, उपनिषदों और अन्य धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान लेने के लिए, उन्होंने दो विद्वान शास्त्रियों को अपने साथ जोड़ लिया, जिनमें से एक रोहतक जिले के गांव टिटौली निवासी पंडित टीकाराम शास्त्री थे।​

उनकी सबसे प्रसिद्ध आध्यात्मिक रचना “लखमी चंद का ब्रह्मज्ञान” (भाग 1 और 2) है, जो आज भी विभिन्न हरियाणवी कलाकारों द्वारा गाई जाती है। इस रचना में वेदांत, कर्म-सिद्धांत, मोक्ष, और जीवन के गहन दार्शनिक प्रश्नों का अद्भुत वर्णन है। उनके ब्रह्मज्ञान में ब्राह्मण धर्म, सृष्टि की रचना, ईश्वर की स्तुति और मानव कर्तव्यों का विस्तृत विवरण मिलता है।​​

लखमी चंद

रागनियां और भजन

सांगों के अलावा, पंडित लखमी चंद ने दर्जनों भजनों और रागनियों की भी रचना की। उनकी रागनियां केवल मनोरंजन के लिए नहीं थीं; वे नैतिक संदेश, सामाजिक टिप्पणियां और जीवन की सच्चाइयों से भरी होती थीं। कुछ प्रसिद्ध रागनियां हैं:​

  • “चल्लिया बालकपन का” (Chaliya Balakpan Ka)​

  • “समय का फेर” (Time’s Cycle)​

  • “हे मानव शुभ कर्म करया कर” (O Human, Do Good Deeds)​

  • प्रेम और आशिकी पर आधारित रागनियां​

उनकी एक प्रसिद्ध पंक्ति है: “कहै लखमीचंद काळ आगै बता किसकी आण अड़ी रहैगी? छोड़ ड्राइवर चल्या गया, टेशन पै रेल खड़ी रह-गी।” (Lakhmi Chand says, before death, tell whose pride will remain? The driver left, the train stood at the station) – यह पंक्ति जीवन की नश्वरता और अहंकार की व्यर्थता को दर्शाती है।​

कला शैली और विशेषताएं

भाषा और शैली

लखमी चंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने सभी सांग और रागनियां शुद्ध हरियाणवी बोली में लिखीं और प्रस्तुत कीं। उस समय जब आधुनिकीकरण और भाषा के समरूपीकरण से स्थानीय परंपराएं खतरे में थीं, लखमी चंद की रचनाओं ने हरियाणवी पहचान को मजबूत किया और लोगों में अपनी क्षेत्रीय भाषा के प्रति गर्व की भावना जगाई।​

उनकी कविताओं में सरल, ग्रामीण परिवेश से ली गई छवियां होती थीं, जो आम जनता के साथ गहराई से जुड़ती थीं। उनके दोहे (couplets) युगों के ज्ञान को समाहित करते थे। एक लोकप्रिय कहावत है: “पोथीयां में जितना है, उतना दादा लखमी की रागनियां में है” (There is as much knowledge in Dada Lakhmi’s ragnis as there is in books)।​

सामाजिक और नैतिक संदेश

लखमी चंद केवल मनोरंजक कलाकार नहीं थे; वे एक सामाजिक सुधारक और नैतिक शिक्षक भी थे। उनकी रचनाएं ईमानदारी, साहस, न्याय, परोपकार, दान, और धर्म के महत्व पर जोर देती थीं। उन्होंने अपनी रागनियों और सांगों के माध्यम से लोगों को अच्छा जीवन जीने के लिए प्रेरित किया।​

उनके सांग केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं थे; वे गहन नैतिक संदेशों से युक्त थे जो ईमानदारी, बहादुरी और न्याय का समर्थन करते थे, जबकि हरियाणवी बोली के आकर्षण का जश्न मनाते थे। उन्होंने स्त्री चरित्रों को भी अपने सांगों में केंद्रीय स्थान दिया, हालांकि वे पितृसत्तात्मक ढांचे के भीतर ही थीं।​

सहज रचना की क्षमता

लखमी चंद की सबसे अद्भुत विशेषता थी उनकी सहज रचना (spontaneous composition) की क्षमता। औपचारिक शिक्षा के बिना, उनकी मौखिक रचनाएं शास्त्रीय साहित्य की गहराई के बराबर थीं। वे किसी भी विषय पर तुरंत रागनी बना सकते थे और मंच पर प्रस्तुत कर सकते थे।​​

प्रमुख शिष्य और परंपरा का विस्तार

पंडित लखमी चंद के मुख्य शिष्यों में पंडित मांगेराम सुसाना (Pandit Mangeram Susana) और मेहर सिंह बरोना (Mehar Singh Barona) शामिल थे। ये शिष्य भी बाद में प्रसिद्ध रागनी गायक बने और दादा लखमी चंद की परंपरा को आगे बढ़ाया।​

पंडित मांगेराम का निधन 1995 में हुआ था, और उन्होंने 1953 से आकाशवाणी पर रागनियां गाईं। वे हरियाणवी लोक साहित्य के विकास में अपने लेखन के माध्यम से भी योगदान दिए। मांगेराम ने एक बार कहा था: “दादा, नाम तेरा रहेगा लेकिन तेरी (रागनी) नहीं गाऊंगा” – यह उनके गुरु के प्रति सम्मान और उनकी अद्वितीयता को स्वीकार करना था।​

पारिवारिक विरासत

पुत्र और पौत्र

लखमी चंद की अथाह और अनमोल विरासत को सहेजने और आगे बढ़ाने के लिए, उनके सुपुत्र पंडित तुलेराम (Pandit Tule Ram) ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई। पंडित तुलेराम ने अपने पिता की परंपरा को जीवित रखा और सांग मंचन जारी रखा।​

इसके बाद, तीसरी पीढ़ी में उनके पौत्र पंडित विष्णु दत्त कौशिक (Pandit Vishnu Dutt Kaushik) अपने दादा की विरासत के संरक्षण और संवर्धन में अत्यंत प्रशंसनीय भूमिका अदा कर रहे हैं। पंडित विष्णु दत्त ने अपने दादा द्वारा रचित सांगों – जैसे ‘ताराचंद’ के तीन भाग, ‘शाही लकड़हारा’ के दो भाग, ‘पूर्णमल’, ‘सरदार चापसिंह’, ‘नौटंकी’, ‘मीराबाई’, ‘राजा नल’, ‘सत्यवान-सावित्री’, ‘कीचक द्रौपदी’, ‘पद्मावत’ आदि – का हजारों बार मंचन किया है।​​

आज भी, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के दूर-दराज के गांवों में पंडित विष्णु दत्त और उनकी टीम लखमी चंद के सांगों का प्रदर्शन करती है, और भारी भीड़ उन्हें देखने-सुनने के लिए दौड़ी चली आती है।​

निधन और अंतिम दिन

पंडित लखमी चंद आध्यात्मिक ज्ञान में इतने डूब गए कि उनमें संत प्रवृत्ति विकसित हो गई। जीवन के अंतिम दशक में, वे वैरागी-सा जीवन जीने लगे और दान एवं पुण्य कार्यों में बढ़-चढ़कर योगदान दिया।​

लंबी बीमारी के उपरांत, 17 अक्टूबर 1945 (कुछ स्रोतों में 17 जुलाई 1945 भी उल्लेख है) की सुबह, मात्र 42 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। उनकी मृत्यु पर समूचे हरियाणा में गहरा शोक छा गया। एक समय था जब यह महान कलाकार इस दुनिया से विदा हो गया, लेकिन उनकी रचनाएं और उनका प्रभाव आज तक जीवित है।​​

विरासत और सांस्कृतिक प्रभाव

हरियाणवी संस्कृति पर प्रभाव

लखमी चंद ने रागनी और सांग को केवल गांव के मनोरंजन से ऊपर उठाकर नैतिक शिक्षण, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक गर्व के शक्तिशाली साधन में बदल दिया। उनकी रचनाओं ने हरियाणवी पहचान को पुनर्जीवित किया और लोगों में अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति नवीनीकृत गर्व की भावना जगाई।​

तुलसीदास की रामचरित मानस, कबीर के सूफी दोहों और मीरा और सूरदास की भक्ति कविताओं के बाद, यदि किसी अन्य कवि ने हरियाणा के लोक मानस की सोच को पूरी तरह से आकार और प्रभावित किया, तो वे लखमी चंद हैं। वे विनम्रता के स्तंभ थे और अपने संपूर्ण ज्ञान और संवर्धन का श्रेय गुरु और भगवान को देते थे।​

शिक्षा और पुरस्कार

हरियाणा सरकार ने उनकी स्मृति में कई पुरस्कार स्थापित किए हैं:

  1. पंडित लखमी चंद पुरस्कार – हरियाणा कला परिषद द्वारा हरियाणवी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है।​

  2. पंडित लखमी चंद कलाकार सामाजिक सम्मान योजना – मई 2025 में हरियाणा सरकार ने इस योजना की घोषणा की, जिसके तहत 60 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ कलाकारों को मासिक वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है (₹10,000 या ₹7,000 प्रति माह, आय के आधार पर)।​

  3. पंडित लखमी चंद राज्य प्रदर्शन और दृश्य कला विश्वविद्यालय (DLC SUPVA), रोहतक – उनके नाम पर एक संपूर्ण विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है। अप्रैल 2022 में, हरियाणा के राज्यपाल-कुलपति श्री बंडारू दत्तात्रेय ने विश्वविद्यालय परिसर में पंडित लखमी चंद की प्रतिमा का अनावरण किया।​

फिल्म और मीडिया में उपस्थिति

2022 में, लखमी चंद के जीवन पर आधारित एक हरियाणवी जीवनी फिल्म “दादा लखमी” (Dada Lakhmi) रिलीज़ हुई। फिल्म का निर्देशन और सह-लेखन यशपाल शर्मा (अभिनेता, जो ‘लगान’ और ‘गंगाजल’ जैसी फिल्मों में अपने प्रभावशाली अभिनय के लिए जाने जाते हैं) ने किया। शर्मा ने स्वयं दादा लखमी की भूमिका निभाई, जबकि मेघना मलिक ने उनकी मां की भूमिका और राजेंद्र गुप्ताने उनके अंधे सांग गुरु मान सिंह की भूमिका निभाई।​

फिल्म को 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2022 में सर्वश्रेष्ठ हरियाणवी फिल्म का पुरस्कार मिला और 57 अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। यह फिल्म हरियाणा अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में बहुत लोकप्रिय हुई।​

Poster of the film 'Dada Lakhmi' (2022) portraying the musical journey of Haryana folk singer Pandit Lakhmi Chand, releasing on 8th Nov 2022, लखमी चंद
Poster of the film ‘Dada Lakhmi’ (2022) portraying the musical journey of Haryana folk singer Pandit Lakhmi Chand, releasing on 8th Nov 2022 

आधुनिक कलाकारों पर प्रभाव

आज भी, दादा लखमी चंद की रचनाएं आधुनिक हरियाणवी कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनकी रागनियां अभी भी गाई जाती हैं और उनके सांग मंचित किए जाते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं में उनकी विरासत का सम्मान किया जाता है।​

2025 में, गायक आर डैनी (R Dany) ने “चल्लिया” नामक एक आधुनिक हरियाणवी रागनी गीत जारी किया, जिसके बोल दादा लखमी चंद द्वारा लिखे गए थे। यह दर्शाता है कि कैसे उनकी रचनाएं आधुनिक संगीत के साथ मिश्रित होकर नई पीढ़ी तक पहुंच रही हैं।​

सामाजिक और साहित्यिक महत्व

लोक परंपरा का वाहन

शोध अध्ययनों में लखमी चंद के सांग को लोक परंपरा के वाहक के रूप में देखा गया है। उनके सांग मिथकों, स्थानीय इतिहास, नैतिक कहानियों और हास्य का मिश्रण थे, जो सामाजिक मूल्यों को मजबूत करते थे और हरियाणा की क्षेत्रीय पहचान को दर्शाते थे।​

नारीवादी और उत्तर-औपनिवेशिक दृष्टिकोण

आधुनिक शोधकर्ताओं ने लखमी चंद के सांगों का विश्लेषण नारीवादी और उत्तर-औपनिवेशिक सिद्धांतों के माध्यम से किया है। जबकि महिलाएं उनके सांगों में केंद्रीय थीं (जैसे सावित्री, द्रौपदी, मीरा), वे अक्सर पितृसत्तात्मक ढांचे के भीतर सीमित थीं। फिर भी, कुछ क्षणों में महिला प्रतिरोध के प्रतीकात्मक संकेत मिलते हैं, हालांकि वे सीमित और नियंत्रित थे।​

संरचनावादी और प्रदर्शन सिद्धांत

सांग केवल पाठ नहीं है बल्कि एक जीवित, नाट्य घटना है। लखमी चंद की काव्य रचनाएं केवल सुनी नहीं जातीं बल्कि सामुदायिक रूप से अनुभव की जाती हैं, अक्सर आध्यात्मिक और नैतिक अर्थों के साथ। सत्यवान-सावित्री, हीर रांझा या राजा हरिश्चंद्र जैसे सांगों में, द्विआधारी विरोध (अच्छाई-बुराई, सत्य-झूठ, धर्म-अधर्म) कथा चाप को संरचित करते हैं और सामाजिक नैतिक संहिताओं को प्रतिबिंबित करते हैं।​

किस्से और कहानियां

गुरु मान सिंह के साथ प्रारंभिक किस्सा

पंडित लखमी चंद और पंडित मान सिंह के गुरु-शिष्य बनने की कहानी भी दो रूपों में सुनी जाती है। एक कथा के अनुसार, बचपन में ही लखमी चंद ने मान सिंह जी के भजन सुने और उनसे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने तुरंत गुरु बनाने का निवेदन किया। गुरु ने उनकी लगन देखकर उन्हें स्वीकार कर लिया।​

विषाक्तता से बचाव और पुनरुद्धार

जब लखमी चंद को जहर दिया गया और उनकी आवाज खराब हो गई, तब कई लोगों ने सोचा कि उनका कलात्मक करियर खत्म हो गया। लेकिन उनकी अदम्य इच्छाशक्ति और निरंतर अभ्यास ने उन्हें पुनः उसी ऊंचाई तक पहुंचने में सक्षम बनाया। यह किस्सा उनके दृढ़ संकल्प और कला के प्रति समर्पण को दर्शाता है।​

जीबी रोड पर भजन

एक प्रसिद्ध किस्सा है कि दादा लखमी ने दिल्ली के जीबी रोड (जो वेश्यावृत्ति के लिए जाना जाता है) पर एक भजन गाया था, जो सामाजिक संदेश से भरा था। यह उनकी निडरता और हर जगह नैतिकता का संदेश पहुंचाने की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।​

नेहरू जी से मिलने का प्रयास

फिल्म “दादा लखमी” में दिखाया गया है कि लखमी चंद ने स्वतंत्रता पूर्व युग में जवाहरलाल नेहरू से एक सार्वजनिक बैठक में मिलने का प्रयास किया था। यह उनकी सामाजिक जागरूकता और राष्ट्रीय मुद्दों में रुचि को दर्शाता है।​

प्रमुख रचनाओं की समीक्षा

राजा हरिश्चंद्र सांग

यह सांग सत्य और त्याग की अमर कथा है। राजा हरिश्चंद्र अपने वचन को पूरा करने के लिए अपना राज्य, पत्नी और पुत्र तक को बेच देते हैं। लखमी चंद ने इस कहानी को इस तरह प्रस्तुत किया कि सुनने वाले की आंखों में आंसू आ जाते हैं। सांग में हरिश्चंद्र के संकल्प की दृढ़ता, उनकी पत्नी तारामती का मौन समर्पण, और अंत में ब्रह्मा, विष्णु और शिव द्वारा दर्शन देने का दृश्य अत्यंत भावुक है।​

सेठ ताराचंद सांग

यह सांग धर्म, दान और पुण्य के महत्व पर केंद्रित है। कहानी में दिखाया जाता है कि दिल्ली का सेठ ताराचंद अपने चचेरे भाई हरिराम की सीख मानकर धर्म का त्याग कर देता है, जिससे उसके परिवार पर विपत्ति आती है। वह इतना गरीब हो जाता है कि एक समय का खाना भी नसीब नहीं होता। अंततः, धर्म की शरण में लौटने पर उसकी स्थिति सुधरती है। यह सांग धर्म, कर्म और ईश्वर में विश्वास के महत्व को दर्शाता है।​

शाही लकड़हारा सांग

यह एक गरीब लकड़हारे की कहानी है जो जंगल से लकड़ी काटकर अपना गुजारा करता है। एक साधु उसे सलाह देता है कि वह अपनी कमाई के चार भाग करे – तीन भाग दान, मंदिर निर्माण आदि में लगाए और एक भाग से घर चलाए। इस सलाह का पालन करके, लकड़हारा धीरे-धीरे समृद्ध हो जाता है। यह सांग दान, सेवा और नैतिक जीवन के महत्व को दर्शाता है।​​

लखमी चंद का ब्रह्मज्ञान

यह आध्यात्मिक रचना वेदांत, उपनिषद और धार्मिक दर्शन का सार प्रस्तुत करती है। इसमें ब्रह्म, माया, आत्मा, कर्म, धर्म, जीवन-मृत्यु, पुनर्जन्म और मोक्ष जैसे गहन विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई है। गंगा की महिमा, ब्राह्मण धर्म के कर्तव्य, और सत्कर्म के महत्व पर जोर दिया गया है।​

एक अंश में कहा गया है: “हे मानव, शुभ कर्म करया कर” (O Human, do good deeds)। यह रचना आज भी धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों में सुनाई जाती है।​

प्रभाव और तुलना

“कालिदास”, “शेक्सपियर” और “सूर्य-कवि”

लखमी चंद को “हरियाणा का कालिदास” और “हरियाणा का शेक्सपियर” कहा जाता है। यह उपाधियां उनकी काव्य प्रतिभा, नाट्यकला में निपुणता और भाषा पर असाधारण अधिकार को दर्शाती हैं। “सूर्य-कवि” (Surya Kavi) की उपाधि उन्हें हरियाणवी रागनी और सांग में उनके उल्लेखनीय योगदान के कारण दी गई।​

तुलना: तुलसीदास, कबीर, मीरा और सूरदास के बाद

विद्वानों का मानना है कि तुलसीदास की रामचरित मानस, कबीर के सूफी दोहे, और मीरा और सूरदास की भक्ति कविताओं के बाद, यदि किसी अन्य कवि ने हरियाणा के लोक मन की सोच को पूरी तरह आकार और प्रभावित किया है, तो वे लखमी चंद हैं। यह तुलना उनके प्रभाव की गहराई और व्यापकता को दर्शाती है।​

समकालीन प्रासंगिकता

आधुनिक हरियाणवी संस्कृति में स्थान

आज, 80 वर्षों बाद भी, दादा लखमी चंद की रचनाएं हरियाणा की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा बनी हुई हैं। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं और उत्सवों में उनकी विरासत का सम्मान किया जाता है। आधुनिक कलाकार अभी भी उनकी रागनियां गाते हैं और उनके सांग मंचित करते हैं।​​

शैक्षिक संस्थानों में अध्ययन

उनके नाम पर स्थापित पंडित लखमी चंद राज्य प्रदर्शन और दृश्य कला विश्वविद्यालय (DLC SUPVA), रोहतक में उनकी विरासत और हरियाणवी कला परंपराओं का अध्ययन और संरक्षण किया जाता है। जुलाई 2025 में, विश्वविद्यालय ने सूर्य कवि पंडित लखमी चंद की जयंती पर एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया, जिसमें उनके पड़पोते पंडित विष्णु दत्त ने पारंपरिक रागनियां प्रस्तुत कीं।​

पुस्तकें और शोध

लखमी चंद की रचनाओं पर कई पुस्तकें और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। “पंडित लखमीचंद कृत ब्रह्मज्ञान” (Pandit Lakhmichand Krit Brahmagyaan), “पंडित लखमीचंद के प्रेमरस के सांग” और “पं. लखमीचंद ग्रंथावली” (Pt. Lakhmi Chand Granthavali) जैसी पुस्तकें उपलब्ध हैं। “पंडित लखमीचंद के सांग साहित्य में लोक चेतना” जैसे शोध कार्य भी प्रकाशित हुए हैं।​

एक अमर विरासत

पंडित लखमी चंद केवल एक कलाकार नहीं थे; वे एक सांस्कृतिक क्रांतिकारी, नैतिक शिक्षक, समाज सुधारक और हरियाणवी पहचान के प्रतीक थे। बिना किसी औपचारिक शिक्षा के, एक गरीब किसान परिवार से आकर, उन्होंने अपनी प्रतिभा, कठिन परिश्रम और समर्पण के बल पर हरियाणवी साहित्य और लोक कला में ऐसा स्थान बनाया जो आज भी अद्वितीय है।​

उनकी रचनाएं केवल मनोरंजन के लिए नहीं थीं; वे जीवन की शिक्षा, नैतिक मूल्यों का प्रसार और सामाजिक चेतना का माध्यम थीं। उन्होंने हरियाणवी भाषा को सम्मान दिलाया और लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति गर्व की भावना जगाई। उनके सांग और रागनियां आज भी गांव-गांव में गूंजती हैं, नई पीढ़ियों को प्रेरित करती हैं और हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान को जीवित रखती हैं।​​

दादा लखमी चंद की विरासत केवल उनकी रचनाओं में नहीं, बल्कि हरियाणा के प्रत्येक उस व्यक्ति के हृदय में जीवित है जो अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं को संजोकर रखता है। जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा था: “काळ आगै किसकी आण अड़ी रहैगी?” – मृत्यु के समक्ष कोई गर्व नहीं टिकता। लेकिन उनका कार्य, उनका योगदान और उनकी विरासत आज भी अमर है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।​

हरियाणा सरकार द्वारा उनके नाम पर स्थापित पुरस्कार, विश्वविद्यालय और योजनाएं इस बात का प्रमाण हैं कि राज्य अपने इस महान सपूत को नहीं भूला है। और जब तक हरियाणवी रागनी और सांग की परंपरा जीवित रहेगी, तब तक सूर्य-कवि दादा लखमी चंद का नाम भी अमर रहेगा।

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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