अंबाला छावनी की कुम्हार मंडी में महंगाई और उचित दाम न मिलने से पुश्तैनी कला संकट में, नई पीढ़ी काम से हो रही दूर

On: October 25, 2026 4:24 AM
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अंबाला: दिवाली का त्योहार हो और घर के आंगन में मिट्टी के दीये न जलें, तो त्योहार की रौनक अधूरी-सी लगती है. दरअसल आधुनिकता के इस दौर में रंग-बिरंगी लाइटों और बिजली की झालरों ने भले ही बाजारों में अपनी जगह बना ली हो, लेकिन मिट्टी के दीयों की लौ आज भी भारतीय संस्कृति और परंपरा की पहचान है. हालांकि, इन दीयों को अपने हाथों से आकार देने वाले कुम्हारों की जिंदगी में अब चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं. बता दे कि महंगाई की मार, मिट्टी की बढ़ती कीमतें, ईंधन की समस्या और मेहनत के मुताबिक दाम न मिलने के कारण अंबाला छावनी की वर्षों पुरानी कुम्हार मंडी में पुश्तैनी कला को आगे बढ़ाना मुश्किल होता जा रहा है. कभी इस काम से जुड़े अनेक परिवारों वाली मंडी में अब महज 7 से 10 लोग ही इस पेशे में सक्रिय बताए जा रहे हैं.

संभाल रहे दादा-परदादा की विरासत

वही अंबाला छावनी की कुम्हार मंडी में कुम्हार राहुल प्रजापति आज भी अपने दादा-परदादाओं की विरासत को संभाल रहे हैं. उनके परिवार में पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने का काम होता आया है. लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए राहुल बताते हैं कि दिवाली के सीजन की तैयारी फरवरी से ही शुरू कर देते हैं. महीनों की मेहनत के बाद छोटे-बड़े दीये, मिट्टी के मंदिर, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां, करवों और त्योहार से जुड़ी दूसरी चीजें तैयार की जाती हैं.इन उत्पादों की मांग केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है बल्कि पंजाब और हिमाचल प्रदेश से भी व्यापारी यहां मिट्टी से बनी दिवाली की वस्तुएं खरीदने पहुंचते हैं. लेकिन राहुल के अनुसार बढ़ती लागत के बीच कुम्हारों के लिए कमाई करना आसान नहीं रह गया है. उनका कहना है कि मिट्टी महंगी हो गई है और दीये पकाने के लिए इस्तेमाल होने वाले बुरादे यानी ईंधन की उपलब्धता और कीमत भी परेशानी बढ़ाती है.

राहुल बताते हैं कि जो बड़ा मिट्टी का दीया वह लगभग 5 रुपये में बेचते हैं, वही खुदरा बाजार में करीब 15 रुपये तक बिकता है. छोटे दीयों के मामले में भी यही अंतर दिखाई देता है. उनके अनुसार, 1,000 छोटे दीये लगभग 600 रुपये में बेचने पड़ते हैं, जबकि बाजार में यही मात्रा करीब 1,200 रुपये में बिक सकती है. यानी मिट्टी को आकार देने, उसे सुखाने और दीये तैयार करने की मेहनत कुम्हार की होती है, लेकिन खुदरा बिक्री का बड़ा अंतर उसके हिस्से में नहीं आता.

दिवाली से चार महीने पहले शुरू कर देते हैं तैयारी

वही 40 वर्षीय मुकेश प्रजापति भी बचपन से इस पुश्तैनी काम से जुड़े हुए हैं. वह बताते हैं कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से मिट्टी की वस्तुएं बना रहा है. दिवाली से करीब चार महीने पहले तैयारियां शुरू हो जाती हैं. छोटे दीयों से लेकर बड़े दीये, लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां और मिट्टी के मंदिर बनाने में लगातार मेहनत करनी पड़ती है. मुकेश के अनुसार, मिट्टी खरीदने से लेकर उसे गीला करने, तैयार करने और फिर उससे सामान बनाने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है. मिट्टी लाने के लिए इस्तेमाल होने वाले रेहड़े का खर्च भी 1,000 रुपये से अधिक हो जाता है,ऐसे में जब लागत और मेहनत के अनुपात में कीमत नहीं मिलती, तो युवाओं का इस काम की ओर आकर्षित होना मुश्किल हो जाता है. मुकेश को चिंता है कि यदि यही स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में यह पारंपरिक हुनर और सिमट सकता है. उनका कहना है कि सरकार को कुम्हारों की मदद करनी चाहिए और उन्हें उचित दरों पर मिट्टी उपलब्ध कराने की व्यवस्था करनी चाहिए, ताकि यह पुश्तैनी काम आगे भी जारी रह सके.

छोटे व्यापारी की यहां से चलती है जीविका

इस मंडी से केवल कुम्हार ही नहीं, बल्कि छोटे व्यापारी भी अपनी आजीविका चलाते हैं. अंबाला की सोनी शर्मा पिछले 13 वर्षों से यहां मिट्टी के दीये और मंदिर खरीदने आ रही हैं. इस बार वह करवाचौथ के लिए करवे खरीदने पहुंची हैं, जिन्हें सदर बाजार में रेहड़ी पर बेचकर वह अपने परिवार का पालन-पोषण करेंगी.सोनी देवी बताती हैं कि यहां उन्हें अच्छी गुणवत्ता की मिट्टी की वस्तुएं अपेक्षाकृत कम दाम पर मिल जाती हैं.उनके अनुसार, यदि कोई व्यापारी यहां से 10,000 रुपये का सामान खरीदता है, तो उसे बाजार में करीब 15,000 रुपये तक में बेचने का अवसर मिल सकता है. इस तरह यह मंडी छोटे कारोबारियों के लिए भी कमाई का जरिया बनी हुई है.

वही अंबाला छावनी की कुम्हार मंडी की कहानी सिर्फ मिट्टी के दीये बनाने तक सीमित नहीं है, यह उन हाथों की कहानी है, जो पीढ़ियों से मिट्टी को आकार देकर दूसरों के घर रोशन करते आए हैं.सवाल यह है कि जब इन हाथों की मेहनत का उचित मूल्य नहीं मिलेगा और नई पीढ़ी इस काम से दूर होती जाएगी, तो आने वाले समय में इन दीयों को कौन बनाएगा? दिवाली पर मिट्टी के दीये खरीदना केवल परंपरा निभाना नहीं, बल्कि उस हुनर और उन परिवारों को सहारा देना भी है, जिनकी मेहनत से त्योहार की असली चमक कायम है.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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