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Surajkund Diwali Mela : क्या आप भी भुट्टे के छिलकों को बेकार समझकर फेंक देते हैं. फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में इन्हीं छिलकों से बनी ट्रे, मैट और आसन लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. फूलजा फाउंडेशन की इस पहल से 2-3 गांवों की 100 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिल रहा है. जानिए कैसे कचरे से कमाई का रास्ता तैयार कर रही हैं ये महिलाएं. लोकल 18 से फूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र बताते हैं कि हमारे गांव में पहले भी दादी भुट्टे के छिलकों से चीजें बनाया करती थीं. हमने उन्हीं से प्रेरणा ली और उनके पुराने तरीकों को थोड़ा नया रूप दिया. प्रदीप कहते हैं कि तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाएं हमारे साथ जुड़ चुकी हैं.
फरीदाबाद. भुट्टा खाने के बाद आप भी उसके छिलकों को बेकार समझकर फेंक देते होंगे, लेकिन क्या आपको पता है कि इन्हीं छिलकों से घर में इस्तेमाल होने वाली खूबसूरत चीजें बनाई जा सकती हैं. फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में एक ऐसी ही स्टॉल लगी है, जहां भुट्टे के छिलकों से बने ट्रे, मैट और बैठने के आसन बेचे जा रहे हैं. इस काम से 100 से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिल रहा है. लोकल 18 से फूलजा फाउंडेशन के प्रोग्राम ऑफिसर प्रदीप चंद्र ने बताया कि आखिर कैसे बेकार समझे जाने वाले छिलकों से महिलाओं की कमाई का रास्ता तैयार किया जा रहा है. प्रदीप के मुताबिक, हम भुट्टे के छिलकों से अलग-अलग तरह के प्रोडक्ट बनाते हैं. लोग भुट्टा खाने के बाद छिलकों को फेंक देते हैं. हमने उन्हीं छिलकों को इकट्ठा किया और गांव की महिलाओं को समझाया कि कचरे से भी अच्छी चीजें बनाई जा सकती हैं. इसके बाद महिलाओं को थोड़ा-बहुत प्रशिक्षण दिया और यूट्यूब की मदद से भी चीजें बनाना सीखा.
कहां से आया आइडिया
प्रदीप चंद्र बताते हैं कि हमारे गांव में पहले भी दादी और बुजुर्ग महिलाएं भुट्टे के छिलकों से चीजें बनाया करती थीं. हमने उन्हीं से प्रेरणा ली और उनके पुराने तरीकों को थोड़ा नया रूप दिया. अब हम अलग-अलग डिजाइन के प्रोडक्ट तैयार करते हैं. हमारा मुख्य उद्देश्य गांव की महिलाओं को रोजगार देना है, ताकि वे अपने पैरों पर खड़ी हो सकें और खुद पैसे कमा सकें. इस काम को शुरू करने का विचार हमारी गांव की दीदी का था. वह चाहती थीं कि गांव की महिलाओं को ऐसा रोजगार मिले, जिसे वे घर पर रहकर भी कर सकें. पुरुष तो किसी न किसी काम के लिए बाहर निकल जाते हैं, लेकिन गांव में महिलाओं के पास रोजगार के अवसर कम होते हैं. अब दो से तीन गांवों की 100 से ज्यादा महिलाएं हमारे साथ जुड़ चुकी हैं.
कितने रुपये कीमत
प्रदीप चंद्र कहते हैं कि इस काम को शुरू किए डेढ़ साल से ज्यादा हो चुका है. हमारे यहां भुट्टे के छिलकों से पांच से छह तरह के प्रोडक्ट बनाए जाते हैं. इन्हें बनाने के लिए ज्यादा पैसे खर्च नहीं करने पड़ते. छिलकों को अलग करके सुखाया जाता है और फिर हाथों से उनकी बुनाई करके डिजाइन तैयार की जाती है. एक ट्रे बनाने में छह से सात घंटे लग जाते हैं. प्रदीप के अनुसार, हमारे यहां भुट्टे के छिलकों से बनी ट्रे 350 रुपये की है. दो मैट 500 रुपये में मिलते हैं. छोटा आसन 700 रुपये और बड़ा फ्लोर मैट 1500 रुपये का है. सभी प्रोडक्ट महिलाओं के घरों पर ही तैयार होते हैं. अभी हमारे पास सामान का स्टॉक कम है. हम ऑर्डर के हिसाब से भी चीजें बनाते हैं.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…









