फरीदाबाद: सोनीपत में तीन बेटियों वाले बुजुर्ग शिवचरण राम रतन गुप्ता की कहानी ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया था. पिता की मौत के बाद बेटियां अंतिम संस्कार में नहीं पहुंचीं और अंतिम संस्कार के लिए 5100 रुपये भेज दिए. वृद्धाश्रम वालों ने ही उनका अंतिम संस्कार किया. इतना ही नहीं, उनकी तीनों बेटियां अस्थि विसर्जन में भी शामिल नहीं हुईं. यह खबर और इसका वीडियो काफी वायरल हुआ था, लेकिन ऐसी कहानी सिर्फ सोनीपत की नहीं है.
फरीदाबाद के सेक्टर 10 वृद्धाश्रम में भी एक बुजुर्ग पिता की कहानी सामने आई है, जिन्होंने बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, उन्हें काबिल बनाया और उनके बेहतर भविष्य के लिए पूरी जिंदगी लगा दी. उनके दोनों बेटे विदेश में अच्छी नौकरी कर रहे थे, लेकिन जब पिता ने दुनिया को अलविदा कहा तो अंतिम संस्कार में दोनों में से कोई भी नहीं पहुंचा.
एक बेटा अमेरिका में, दूसरा ऑस्ट्रेलिया में
Local18 से बातचीत में अनीता मलिक बताती हैं कि हरकुश देव सिंह पन्नों मेरे वृद्धाश्रम में रहते थे. फरीदाबाद के सेक्टर-7 में उनका घर था और हम उन्हें उनके घर से लेकर आए थे. उनका एक बेटा अमेरिका में रहता है, जबकि दूसरा बेटा ऑस्ट्रेलिया में रहता है. वह करीब 5 महीने तक हमारे वृद्धाश्रम में रहे थे. वह काफी बुजुर्ग थे और बाद में उनकी तबीयत भी खराब रहने लगी थी. अनीता मलिक बताती हैं कि परिवार से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो पाई. तबीयत खराब होने के बाद वृद्धाश्रम की तरफ से उनका इलाज भी करवाया गया.
फौज से रिटायर्ड, घर में अकेले
अनीता मलिक बताती हैं कि 29 जुलाई 2026 को हरकुश देव सिंह पन्नों का निधन हो गया. उनकी उम्र करीब 98 साल थी. वह इतने बुजुर्ग थे कि ठीक से खड़े भी नहीं हो पाते थे. अनीता मलिक बताती हैं कि मैं रोज उन्हें नहलाती थीं और उनकी देखभाल करती थीं. वह मूलरूप से शायद पंजाब के रहने वाले थे, क्योंकि उनकी मानसिक हालत भी पूरी तरह ठीक नहीं रहती थी. अनीता मलिक बताती हैं कि हरकुश देव सिंह पन्नों फौज से रिटायर्ड थे और सेना में अच्छी पोस्ट पर रहे थे. जब उनकी मौत हुई तो उनके दोनों बेटों से संपर्क करने की कोशिश की गई. एक बेटे का नंबर उनके पास नहीं था, जबकि दूसरे बेटे को फोन किया गया, लेकिन उसने फोन नहीं उठाया.
अनीता मलिक बताती हैं कि फरीदाबाद में उनका कोई करीबी रिश्तेदार भी नहीं था, ऐसे समय में उनके पड़ोसियों ने मदद की और आखिरकार वृद्धाश्रम की तरफ से ही उनका अंतिम संस्कार किया गया. बच्चों को अपने मां-बाप के साथ ऐसा नहीं करना चाहिए. जिन पिता ने बच्चों को पढ़ाया लिखाया, उन्हें बड़ा किया और इस लायक बनाया कि आज वह विदेश में नौकरी कर रहे हैं, वही पिता अपनी जिंदगी के आखिरी समय में अकेले रह गए.
आखिरी समय में बच्चों ने छोड़ दिया साथ
अनीता मलिक बताती हैं कि पिता की मौत के बाद अंतिम संस्कार में भी दोनों बेटों का नहीं पहुंचना बेहद दुखद है. जिस पिता ने पूरी जिंदगी बच्चों के लिए लगा दी, उन्हें आखिरी समय में बच्चों का साथ तक नहीं मिल पाया. अनीता मलिक बताती हैं कि मेरे वृद्धाश्रम में पहले भी ऐसी घटना सामने आ चुकी है. गुरमुख दास मनोचा नाम के एक बुजुर्ग का भी इसी वृद्धाश्रम में निधन हुआ था. उनका एक बेटा ऑस्ट्रेलिया में रहता था और दूसरा फरीदाबाद के सेक्टर 16 में रहता था. परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था, लेकिन बेटों ने बुजुर्ग पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ दिया था. उनके साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.
मां-बाप को छोड़ देते हैं अकेला
अनीता मलिक बताती हैं कि मैं बच्चों से सिर्फ इतना कहना चाहती हैं कि अपने मां-बाप के साथ ऐसा व्यवहार ना करें. जब बच्चे छोटे होते हैं, तो मां बाप उन्हें चलना सिखाते हैं, उनका हाथ पकड़कर जिंदगी में आगे बढ़ाते हैं और अपनी जरूरतों से पहले बच्चों की जरूरतों का ख्याल रखते हैं. आज अगर वही बच्चे अपने बूढ़े मां-बाप को अकेला छोड़ देंगे, तो उन्हें यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि जिंदगी का यही व्यवहार आगे चलकर उनके अपने बच्चों के सामने भी आ सकता है. सोनीपत के शिवचरण राम रतन गुप्ता हों या फरीदाबाद के हरकुश देव सिंह पन्नों, ऐसी कहानियां सिर्फ खबर नहीं हैं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा सवाल हैं कि आखिर जिन मां-बाप ने बच्चों को अपनी पूरी जिंदगी दे दी, उनके बुढ़ापे में उनके पास अपनों के लिए समय क्यों नहीं बचता.











