फ़ौजी मेहर सिंह: हरियाणा के वीर कवि और स्वतंत्रता सेनानी, जिन्होंने अपनी रागनियों और किस्सों के माध्यम से देशभक्ति का संदेश फैलाया

On: January 6, 2026 10:32 AM
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फ़ौजी मेहर सिंह

फ़ौजी मेहर सिंह दहिया (1918-1945) हरियाणा के एक प्रसिद्ध कवि, गायक और स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्होंने अपनी रागनियों और किस्सों के माध्यम से देशभक्ति का संदेश फैलाया। सोनीपत जिले के बरोणा गांव में पैदा हुए मेहर सिंह ने अपने मात्र 27 वर्षों के जीवन में लगभग 450 रचनाएं की, जिनमें 13 पूर्ण किस्से और 60 देशभक्ति गीत शामिल हैं। वे आजाद हिंद फौज में शामिल होकर भारत की आजादी के लिए लड़े और 1945 में रंगून में शहीद हो गए।

The Life and Legacy of Fauji Mehar Singh: Timeline from Birth to Martyrdom (1918-1945)
The Life and Legacy of Fauji Mehar Singh: Timeline from Birth to Martyrdom (1918-1945) 

बचपन और पारिवारिक पृष्ठभूमि

मेहर सिंह का जन्म 15 फरवरी 1918 को सोनीपत जिले की खरखौदा तहसील के बरोणा गांव में नंदराम के घर हुआ था। दहिया जाट परिवार में जन्मे मेहर सिंह चार भाइयों—भूप सिंह, मांगेराम और कंवर सिंह—में सबसे बड़े थे। इसके अलावा उनकी एक बहन सहजो देवी भी थी। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, जिस कारण पढ़ाई में प्रतिभाशाली होने के बावजूद मेहर सिंह केवल तीसरी कक्षा तक ही पढ़ सके।

परिवार की गरीबी के कारण बचपन से ही मेहर सिंह को पशु चराने और कृषि कार्यों में हाथ बंटाने पड़े। किंतु रागनी गायन के प्रति उनका जुनून इन सभी काम-धंधों से कहीं बड़ा था। घर के अंदर रागनी गाने पर प्रतिबंध था क्योंकि उनके पिता का मानना था कि रागनी गाना डूमों का काम है, जाटों का नहीं। परिवार की परंपरा और सामाजिक मानदंडों की परवाह किए बिना, मेहर सिंह जब भी और जहां भी मौका मिलता, रागनी गाने लगते थे।

एक प्रसिद्ध कहानी के अनुसार, मेहर सिंह एक बार किढौली गांव के सीमावर्ती खेतों में हल जोतने गए। वहां के लोगों ने उनसे गाने की फरमाइश कर दी, और मेहर सिंह सुबह सवेरे से ही रागनी गाने में लगा दिए। दोपहर को उनके भाई भूप सिंह खाना लेकर आए तो पाया कि हल जहां का तहां खड़ा है और किढौली के लोग रागनी सुनने में मशगूल हैं। यह घटना उनके पिता नंदराम को बहुत नाराज कर गई, लेकिन इसने मेहर सिंह के संकल्प को तोड़ा नहीं।

शादी और फौजी जीवन की शुरुआत

मेहर सिंह की रागनी गायन से परेशान पिता ने उनका विवाह समसपुर गांव के लखीराम की बेटी प्रेमकौर के साथ कर दिया। प्रेमकौर की पिता भी गायन-संगीत में रुचि रखते थे, जिससे प्रेमकौर भी मेहर सिंह के संगीत को समझती थीं। विवाह के बाद भी मेहर सिंह की रागनी लिखने और गाने का सिलसिला जारी रहा। परिजनों के विरोध के बावजूद उन्होंने अपनी रचनात्मकता को जीवित रखा।

1936 में मेहर सिंह को उनकी इच्छा के विरुद्ध जाट रेजिमेंट में भर्ती करा दिया गया। जाट रेजिमेंट के अभिलेखों के अनुसार, उनकी भर्ती की तारीख 2 सितंबर 1936 थी, हालांकि कुछ स्रोत 1937 का उल्लेख करते हैं। फौज में भर्ती होने पर उन्होंने अपनी भावनाओं को एक रागनी के माध्यम से व्यक्त किया:

“देश नगर घर गाम छूटग्या, कित का गाणा गाया रै।
कहै जाट तै डूम हो लिया, बाप मेरा बहकाया रै।।”

फौज में प्रवेश के बाद मेहर सिंह को एक नई आजादी मिली। यहां उन्हें पिता की तरह रोकने वाला कोई नहीं था। वे अपनी तहलकों को स्वतंत्रता से गा सकते थे, रचनाएं बना सकते थे, और अपने साथियों को रागनियों के माध्यम से मनोरंजन दे सकते थे। उनकी रागनियां सभी साथियों और अधिकारियों को बहुत पसंद आती थीं।

सैनिक जीवन और रचनात्मकता

फौजी जीवन मेहर सिंह की रचनाशील प्रतिभा का केंद्र बन गया। फौज में विभिन्न स्थानों पर पोस्टेड रहते हुए, वे दिल्ली, रंगून और अन्य शहरों में अपनी रागनियां गाते रहे। यहां तक कि माचिस की डिब्बी पर भी उन्होंने रागनियां गाई हैं। फौजी जीवन की कठोरता और अलगथलग रहने की पीड़ा ने उनकी कृतियों को गहरा बनाया।

उनकी एक प्रसिद्ध रागनी उनकी छुट्टी के दिनों की पीड़ा को व्यक्त करती है:

“छुट्टी के दिन पूरे होगे, फिकर करन लगा मन में।
बांध बिस्तरा चाल पड़ा, के बाकि रहगी तन में।।”

मेहर सिंह की लेखनी पर फौजी जीवन का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि उन्होंने फौजी जीवन को ही आधार बनाकर अनेक रचनाएं कीं। हालांकि, उनकी रागनियां केवल फौजी जीवन तक सीमित नहीं थीं। किसान जीवन, पारस्परिक प्रेम, विरह, सुख-दुख, सामाजिक समस्याएं—सभी विषयों पर उन्होंने खूब लिखा। हरियाणा के अलावा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली और राजस्थान में भी उनकी रागनियां लोकप्रिय रहीं।

मेहर सिंह को “ड्रीम पोएट” के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि उन्होंने अपनी अधिकतर रचनाएं सपनों में देखी हुई घटनाओं को आधार बनाकर लिखीं। उनकी कुछ रागनियां वर्तमान समय में भी गायक दिलेर खरकिया की आवाज में गाई जाती हैं, जैसे ‘सपना’ और ‘अपना’।

प्रमुख रचनाएं और किस्से

मेहर सिंह ने लगभग 450 रचनाएं की, जिनमें 13 पूर्ण किस्से शामिल हैं। इन किस्सों में अधिकांश पारंपरिक लोक कथाओं पर आधारित हैं, लेकिन मेहर सिंह ने उन्हें अपनी अद्भुत काव्य शैली से सजाया है। उनके प्रमुख किस्से हैं:

मुख्य किस्से:

उनकी लगभग 60 रचनाएं देशभक्ति और स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित हैं। शृंगार रस, विरह, सामाजिक विषय, किसान जीवन—सभी विषयों पर उन्होंने समान दक्षता से काम किया। उनकी रागनियां हरियाणवी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई हैं।

आजाद हिंद फौज से जुड़ाव

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मेहर सिंह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से गहराई से जुड़ गए। एक दिन जब दूसरे विश्व युद्ध की तैयारी चल रही थी, तो आजाद हिंद फौज का एक सिपाही उनकी पलटन की गिरफ्त में आ गया। ब्रिटिश सेना ने उस सिपाही को कठोर दंड दिया। इस दृश्य को देखकर मेहर सिंह का खून खोल उठा। उन्होंने उस सिपाही को मुक्त करवा दिया और नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से काफी प्रभावित हुए।

अंततः मेहर सिंह और उनके अधिकांश साथियों ने ब्रिटिश सेना में विद्रोह कर दिया और आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानते थे। एक ऐतिहासिक तथ्य के अनुसार, 2 जुलाई 1933 को कुसंग हाई स्कूल, रंगून में नेताजी को एक पार्टी दी गई थी, और मेहर सिंह की रागनी नेताजी ने रात 11 बजे तक सुनी।

नेताजी के स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयासों को मेहर सिंह ने एक रागनी में यह व्यक्त किया:

“घड़ी बीती ना पल गुजरे, उतरा जहाज शिखर तैं।
बरसण लागै फूल बोस पै, हाथ मिले हिटलर तैं।।”

शहादत और विरासत

मेहर सिंह को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था। तभी उनकी कलम से यह रागनी निकली:

“साथ रहणियां संग के साथी, दया मेरे पै फेर दियो।
देश के ऊपर जान झौंक दी, लिख चिट्ठी में गेर दियो।।”

1945 में रंगून की लड़ाई के दौरान मेहर सिंह का स्वास्थ्य बिगड़ गया। उन्हें संग्रहणी (पेचिश) नामक रोग हो गया। उनके साथी और शिष्य सुसाना ने अपने लेखन में कहा है कि मेहर सिंह की मृत्यु 15 मार्च 1945 को रंगून के एक अस्पताल में हुई। कुछ स्रोतों के अनुसार, उनकी शहादत की तारीख 31 दिसंबर 1944 थी, लेकिन अधिकांश विश्वसनीय स्रोत 1945 को स्वीकार करते हैं।

मेहर सिंह ने भारत की आजादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी, लेकिन सिंगापुर की सीमा पर नहीं, बल्कि ब्रह्मा (अब म्यानमार) की सीमा पर। वह केवल 27 वर्ष की उम्र में शहीद हो गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवंत है।

विरासत और सम्मान

आज भी मेहर सिंह की विरासत हरियाणा की लोक संस्कृति में जीवंत है। उनके गांव बरोणा में उनका एक स्मारक और पार्क बनाया गया है। 15 फरवरी को उनकी जयंती के अवसर पर हर साल बरोणा गांव में रागनी गायन कार्यक्रम आयोजित किया जाता है।

हरियाणा सरकार ने उनके सम्मान में “फौजी जाट मेहर सिंह अवॉर्ड” की स्थापना की है, जो लोक गायकों को हरियाणा की संस्कृति और परंपराओं को बढ़ावा देने के लिए दिया जाता है। उनकी रागनियां आज भी विभिन्न मंचों पर गाई जाती हैं, और उनकी कृतियां हरियाणवी साहित्य के एक महत्वपूर्ण अंग के रूप में मान्यता प्राप्त हैं।

मेहर सिंह के व्यक्तित्व को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे जातिगत संकीर्णता से ऊपर थे। हालांकि उनके समय में जाटों द्वारा रागनी गायन को नीच समझा जाता था, पर मेहर सिंह ने इस परंपरा को अपनाया और उसे एक उच्च कलात्मक रूप दिया। उन्होंने ना केवल गायन में बल्कि देशभक्ति के क्षेत्र में भी “जय जवान, जय किसान” का अर्थ साकार किया।

निष्कर्ष: फ़ौजी मेहर सिंह केवल एक कवि या गायक नहीं थे, बल्कि एक सामाजिक चेतना के वाहक थे। उनकी रागनियों ने किसानों के दर्द को, सैनिकों की कठोरता को, और देश की आजादी की चाहत को सामने लाया। उनके जीवन और कृतियों के माध्यम से हरियाणा की लोक परंपरा, भाषा और स्वतंत्रता संग्राम का अद्भुत संयोजन देखने को मिलता है। आज, जब हरियाणा से संबंधित ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर चर्चा होती है, तो फ़ौजी मेहर सिंह का नाम गर्व से लिया जाता है।

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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