हरियाणा के सिरसा जिले के रानिया खंड के गांव चक्का से एक ऐसी प्रेरणादायक कहानी सामने आई है, जिसने ग्रामीण महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की दिशा में नई मिसाल कायम की है। ग्रामसखी और जलसखी ममता ने न केवल खुद को सीमित दायरे से बाहर निकाला, बल्कि करीब 70 से 80 महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़कर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया है। उनके इस प्रयास को अब राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल रही है।
ममता कभी गांव की गलियों तक सीमित जीवन जीती थीं, लेकिन आज वे सामाजिक नेतृत्व की पहचान बन चुकी हैं। उन्होंने हरियाणा ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गांव में सात महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन और संचालन किया है। इन समूहों के माध्यम से उन्होंने दर्जनों परिवारों को नियमित आय का जरिया उपलब्ध कराया है।
उनके नेतृत्व में जो महिलाएं पहले केवल घरेलू जिम्मेदारियों तक सीमित थीं, वे आज हर महीने 10 से 15 हजार रुपये तक की कमाई कर रही हैं। यह बदलाव सिर्फ आय का नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान का भी है। विभाग ने समूहों के बेहतर संचालन और पारदर्शी प्रबंधन को देखते हुए मिट्टी जांच मिशन और कृषि यंत्रों पर अनुदान राशि भी प्रदान की है, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त मजबूती मिली है।
ममता बताती हैं कि यह सफर एक छोटे से प्रयास से शुरू हुआ था। उन्होंने गांव की पांच से छह महिलाओं को इकट्ठा कर एक समूह बनाया और मिठाई बनाने का काम शुरू किया। शुरुआत में यह प्रयास सीमित था, लेकिन गुणवत्ता और मेहनत के दम पर धीरे-धीरे अन्य महिलाएं भी जुड़ती गईं। देखते ही देखते यह पहल 70 से 80 परिवारों तक पहुंच गई और आज यह गांव की पहचान बन चुकी है।
उनका कहना है कि उनका उद्देश्य केवल कमाई कराना नहीं, बल्कि उन महिलाओं को मंच देना है जो घर की चारदीवारी में रहते हुए भी आत्मनिर्भर बनना चाहती हैं। वे और उनकी टीम लगातार नई महिलाओं को जोड़ने और उन्हें प्रशिक्षण देने का काम कर रही हैं।
ममता की सफलता के पीछे उनके परिवार का भी बड़ा योगदान है। उन्होंने बातचीत में बताया कि उनके पति डॉ. राधे श्याम छापौला का हर कदम पर पूरा सहयोग मिला। इसी समर्थन ने उन्हें सामाजिक कार्यों में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया।
आज रानिया खंड में ममता एक रोल मॉडल के रूप में देखी जा रही हैं। ग्रामीण महिलाओं के लिए वे प्रेरणा का स्रोत बन चुकी हैं और उनकी पहल यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास से गांव की महिलाएं भी राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकती हैं।
यह कहानी न केवल सिरसा बल्कि पूरे हरियाणा के लिए एक सकारात्मक संदेश है कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो तो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ा बदलाव संभव है।













