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Balaji Seva Samiti Ambala : 18 साल के बेटे को रेल हादसे में खोने के बाद अंबाला के जगदीश कुमार और उनकी पत्नी की जिंदगी हमेशा के लिए बदल गई. दोनों ने अपनी पीड़ा को समाजसेवा की ताकत बना लिया. अपने बेटे को कामयाब बनाने का सपना भले अधूरा रह गया हो, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. दोनों श्री बालाजी सेवा समिति से जुड़ गए. ये समिति शिक्षा से लेकर गरीब परिवारों की मदद और लावारिस शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार तक कई सामाजिक कार्य कर रही है. जगदीश कुमार लोकल 18 से बताते हैं कि संस्था ने दो स्कूलों को अडॉप्ट किया है. इन स्कूलों में करीब 200 जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई का खर्च बालाजी सेवा समिति उठा रही है.
अंबाला. कहते हैं कि किसी मां-बाप के लिए अपनी औलाद से बढ़कर कुछ नहीं होता है, लेकिन अंबाला के जगदीश कुमार और उनकी पत्नी ने अपने 18 वर्षीय बेटे को रेल हादसे में खोने के बाद जिस तरह अपने दर्द को समाजसेवा की ताकत में बदला, वह इंसानियत की मिसाल है. बेटे को कामयाब इंसान बनाने का सपना भले अधूरा रह गया, लेकिन इसी सपने को उन्होंने जरूरतमंद बच्चों की जिंदगी में पूरा करने की ठानी. आज श्री बालाजी सेवा समिति शिक्षा से लेकर गरीब परिवारों की मदद और लावारिस शवों के सम्मानजनक अंतिम संस्कार तक कई सामाजिक कार्य कर रही है. श्री बालाजी सेवा समिति की शुरुआत वर्ष 2008 में कुछ दोस्तों ने मिलकर समाजसेवा के उद्देश्य से की थी. धीरे-धीरे संस्था से करीब 50 सदस्य जुड़े और सभी अपने स्तर पर योगदान देकर सेवा कार्यों को आगे बढ़ाने लगे. संस्था का काम किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा. जरूरतमंद परिवारों की मदद, गरीब बच्चों की शिक्षा, बेटियों की शादी और अंतिम संस्कार जैसे कार्य लगातार किए जा रहे हैं.
कैसे जुड़े जगदीश
संस्थापक सतीश गौरी लोकल 18 से बताते हैं कि संस्था की शुरुआत उस समय हुई, जब एक गरीब मजदूर का परिवार अपने परिजन का अंतिम संस्कार कराने में असमर्थ था. संस्था ने अपनी क्षमता के अनुसार मदद की और यहीं से जरूरतमंद परिवारों की सहायता का सिलसिला शुरू हुआ. संस्था लावारिस और बेसहारा लोगों के अंतिम संस्कार के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध करवाती है. एक अंतिम संस्कार में 5 से 10 हजार रुपये तक का खर्च आता है, जिसे संस्था के सदस्य मिलकर वहन करते हैं. वर्ष 2011 में जगदीश कुमार के 18 वर्षीय बेटे की एक रेल हादसे में मौत हो गई थी. बेटे को पढ़ा-लिखाकर कामयाब बनाने का सपना देखने वाले परिवार के लिए यह बड़ा सदमा था. हालांकि, कुछ समय बाद जगदीश कुमार की पत्नी ने इसी सपने को जरूरतमंद बच्चों के साथ जोड़ लिया. उन्होंने संस्था के साथ मिलकर बच्चों को निशुल्क पढ़ाना शुरू किया. शुरुआत में केवल तीन बच्चे ट्यूशन पढ़ने पहुंचे, लेकिन धीरे-धीरे संख्या बढ़कर करीब 80 और फिर 120 से होते हुए 200 तक पहुंच गई.
कोरोना काल में आई दिक्कत
जगदीश कुमार लोकल 18 से बताते हैं कि कोरोना काल में ट्यूशन सेंटर कुछ समय के लिए बंद हुए, जिसके बाद संस्था ने दो स्कूलों को अडॉप्ट किया. इन स्कूलों में करीब 200 जरूरतमंद बच्चों की पढ़ाई का खर्च संस्था उठा रही है. शालीमार कॉलोनी और नया गांव में भी करीब 20 से 30 बच्चों को ट्यूशन दी जा रही है. बच्चों की किताबें, वर्दी, जूते और दूसरे जरूरी सामान का खर्च भी संस्था की ओर से उठाया जाता है. जगदीश कहते हैं कि संस्था की ओर से हर महीने करीब 10 से 15 गरीब परिवारों को राशन दिया जाता है. अब तक करीब 200 गरीब परिवारों की बेटियों की शादी में सहयोग किया जा चुका है. शादी के दौरान जरूरत के मुताबिक फर्नीचर और अन्य सामान भी उपलब्ध कराया जाता है.
ताकि सम्मान से वंचित न होना पड़े
जगदीश बताते हैं कि कोरोना काल में संस्था ने करीब 400 परिवारों को राशन उपलब्ध कराया था. मरीजों को स्टीमर मशीन भी निशुल्क दी गई. संस्था की ओर से समय-समय पर मेडिकल कैंप भी लगाए जाते हैं. कई शिक्षकों को वेतन पर नियुक्त कर जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाया जा रहा है. जगदीश के मुताबिक, उनका उद्देश्य है कि आर्थिक तंगी किसी बच्चे की पढ़ाई के रास्ते में बाधा न बने और किसी बेसहारा व्यक्ति को अंतिम समय में सम्मान से वंचित न होना पड़े.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…
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