फरीदाबाद: नशे की लत कई परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन जाती है. शराब, गुटखा, तंबाकू और दूसरे नशीले पदार्थों की आदत के कारण कई बार लोगों के रिश्ते खराब हो जाते हैं और परिवार टूटने की स्थिति तक पहुंच जाते हैं. नशा छुड़ाने के लिए लोग दवाइयों और अलग-अलग उपचार का सहारा भी लेते हैं. लेकिन फरीदाबाद के अटाली गांव में एक ऐसा मंदिर है, जिसे लेकर ग्रामीणों की गहरी आस्था है. ग्रामीणों का दावा है कि इस मंदिर में आकर प्रार्थना करने और कुछ समय बैठने से नशे की लत छोड़ने की प्रेरणा मिलती है. उनका कहना है कि कई लोग यहां आकर नशा छोड़ चुके हैं. अटाली गांव के इस मंदिर को बाबा लाल दास जी महाराज का मंदिर बताया जाता है.
करीब 475 साल पहले हुए थे बाबा लाल दास
Local18 से बातचीत में ग्रामीण कर्मवीर सिंह ने बताया कि बाबा लाल दास जी महाराज करीब 475 साल पहले हुए थे. उनके अनुयायियों में हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग शामिल थे. बाबा लाल दास भगवान राम के भक्त थे और राम नाम का जाप करते थे. उनके भक्त नशे से दूर रहते थे और अंडा, मांस तथा शराब का सेवन नहीं करते थे.
जहरीले कुएं से जुड़ी है बाबा लाल दास की मान्यता
कर्मवीर सिंह बताते हैं कि बाबा लाल दास से जुड़े कई पुराने प्रसंग भी बताए जाते हैं. राजस्थान के अलवर क्षेत्र में एक स्थान को जहर का कुआं कहा जाता था. मान्यता थी कि उसका पानी पीने से व्यक्ति की मौत हो जाती थी. बाबा लाल दास के जीवन से जुड़ी मान्यताओं में यह भी बताया जाता है कि उन्होंने उस कुएं का पानी पिया और वह पानी मीठा हो गया. उस समय के शासकों की ओर से बाबा लाल दास को परेशान किए जाने और जेल में बंद किए जाने की बातें भी लोककथाओं में कही जाती हैं.
अलवर से लेकर हरियाणा तक बने हैं मंदिर
कर्मवीर बताते हैं कि बाबा लाल दास का सबसे बड़ा मंदिर राजस्थान के अलवर के शेरपुर इलाके में है और हरियाणा समेत कई जगहों पर उनके मंदिर बने हुए हैं. अटाली गांव में बना मंदिर भी काफी पुराना बताया जाता है. यहां बाबा लाल दास के साथ हनुमान जी, मां पार्वती, राधा-कृष्ण और भगवान शिव के मंदिर भी हैं. मंदिर परिसर में एक तालाब और पुस्तकालय के लिए हॉल भी बनाया गया है.
नौकरी लगने पर पहली तनख्वाह मंदिर में देते हैं लोग
कर्मवीर सिंह बताते हैं कि मंदिर के प्रति लोगों की आस्था काफी ज्यादा है. दूर-दूर से लोग यहां दर्शन करने आते हैं. जिन युवाओं या लोगों की सरकारी नौकरी लगती है, उनमें से कई लोग अपनी पहली तनख्वाह मंदिर में सेवा के रूप में देते हैं. यह परंपरा उन्होंने शुरू की थी और अब कई लोग इसे आगे बढ़ा रहे हैं. कुछ लोग निजी नौकरी लगने या अपना कारोबार शुरू होने के बाद भी यहां आकर धन्यवाद के रूप में सेवा करते हैं. मंदिर में हर साल फाल्गुन पूर्णिमा के आसपास भंडारे का आयोजन भी किया जाता है.
भंडारे में हजारों लोगों के लिए बनता है प्रसाद
कर्मवीर सिंह बताते हैं कि इस दौरान करीब 5 से 7 हजार लोगों के लिए भोजन प्रसाद तैयार किया जाता है. अटाली गांव में यह मंदिर सबसे पुराने मंदिरों में से एक है और गांव बसने के समय से ही इसके होने की बात कही जाती है.
ग्रामीणों का दावा, मंदिर में आने से मिलती है नशा छोड़ने की प्रेरणा
कर्मवीर सिंह बताते हैं कि नशे को लेकर कहा जाता है कि जो व्यक्ति किसी भी तरह के नशे का आदी है, अगर वह मंदिर में आकर कुछ समय बैठता है और भगवान से प्रार्थना करता है, तो उसे नशा छोड़ने की प्रेरणा मिल सकती है. इसे बाबा लाल दास की कृपा और मंदिर से जुड़ी आस्था बताया गया. यहां आने के बाद व्यक्ति को कुछ समय के लिए नशे की याद तक नहीं आती.
नशा मुक्ति के लिए इलाज भी जरूरी
कर्मवीर सिंह बताते हैं कि नशे की लत से परेशान व्यक्ति अगर विश्वास के साथ यहां आए और मंदिर में बैठे, तो उसके जीवन में बदलाव आ सकता है. इसे किसी दवा या अपने व्यक्तिगत प्रयास का परिणाम नहीं बताया, बल्कि बाबा लाल दास की कृपा और लोगों की आस्था से जोड़कर देखा. नशे की लत एक गंभीर समस्या है और केवल धार्मिक आस्था के भरोसे इलाज छोड़ना उचित नहीं है. नशे की आदत वाले व्यक्ति को जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सलाह और नशा मुक्ति उपचार भी लेना चाहिए. अटाली मंदिर को लेकर नशा छोड़ने की बात फिलहाल ग्रामीणों की आस्था और उनके अनुभवों पर आधारित है.













