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Surajkund Diwali Mela Faridabad : सूरजकुंड दिवाली मेले में बीन बजाकर लोगों को हंसाने वाले सपेरा समुदाय के कलाकारों की जिंदगी में दर्दनाक हो चुकी है. सांपों का खेल दिखाने पर प्रतिबंध के बाद पुराना रोजगार छिन गया. कलाकार अब मेले और शादियों में कार्यक्रम कर परिवार पाल रहे हैं. कलाकारों की मांग है कि सरकार उन्हें साल में कम से कम 100 दिन काम दे, ताकि उनके साथ कला भी जिंदा रहे. सपेरा समुदाय से आने वाले विनोद लोकल 18 से बताते हैं कि बीन बजाना हमारा खानदानी काम है. वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सांपों का खेल दिखाने पर प्रतिबंध लगने के बाद हमारा पुराना रोजगार छिन गया. हमारी पीढ़ियों से चली आ रही कला अब धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है.
फरीदाबाद. कभी गांव-गांव जाकर सांपों का खेल दिखाना सपेरा समुदाय की रोजी-रोटी का जरिया हुआ करता था, लेकिन बदलते समय और सांपों के खेल पर प्रतिबंध के बाद इस पारंपरिक कला से जुड़े लोगों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया है. फरीदाबाद के सूरजकुंड दिवाली मेले में हरियाणा के पानीपत से आए सपेरा समुदाय के आठ कलाकार अपनी बीन की धुन और कला से लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. हालांकि, दूसरों को अपनी कला दिखाने वाले इन कलाकारों के लिए परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं है. मेले में इन्हें प्रतिदिन के हिसाब से मेहनताना मिलता है, लेकिन कमाई इतनी ही होती है कि किसी तरह घर का गुजारा चल सके. इन कलाकारों के लिए सालभर नियमित काम मिलना भी मुश्किल है. इनके मुताबिक, साल में मुश्किल से 8 से 10 कार्यक्रम ही मिल पाते हैं. शादी-विवाह और मेलों के दौरान ये अपनी कला दिखाकर कुछ कमाई कर लेते हैं, जबकि काम न मिलने पर कई कलाकार निजी संस्थानों में मजदूरी या दूसरे छोटे-मोटे काम करने को मजबूर होते हैं.
रोजगार छिन गया
लोकल 18 से विनोद बताते हैं कि मैं सपेरा जाति से आता हूं, बीन बजाना हमारा खानदानी काम है. यह कला हमें विरासत में मिली है. पहले हमारे बुजुर्ग गांव-गांव जाकर सांपों का खेल दिखाते थे. लोग इकट्ठा होते थे और हमारे खेल को देखकर खुश होते थे. लेकिन वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए सांपों का खेल दिखाने पर प्रतिबंध लगने के बाद हमारा पुराना रोजगार छिन गया. इसका असर हमारी पूरी बिरादरी पर पड़ा है. हमारी जो कला पीढ़ियों से चली आ रही थी, वह अब धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है.
विनोद बताते हैं कि पहले हम गांवों में जाते थे, तो हमारे साथ बच्चे और शिष्य भी रहते थे. वे बीन और दूसरे वाद्य यंत्र बजाना सीखते थे. धीरे-धीरे इस तरह हमारी कला एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती थी. लेकिन आज के बच्चे पढ़ाई-लिखाई में आगे बढ़ रहे हैं और बीन बजाने की कला से दूर होते जा रहे हैं. अगर कलाकारों को लगातार काम नहीं मिलेगा, तो आने वाले समय में हमारी इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लोग भी कम हो जाएंगे. राजा नाथ बताते हैं कि हम पानीपत के वजीरपुर टाइटना से आठ लोगों की टीम लेकर यहां आए हैं. सरकार मेलों में हमें कार्यक्रम करने का मौका देती है. इसके लिए हमें काम के दिनों के हिसाब से पैसे मिलते हैं, जो सीधे हमारे खाते में आते हैं. सरकार के इस सहयोग से हमें राहत मिलती है, लेकिन परेशानी यह है कि मेले सालभर नहीं चलते. एक मेला खत्म होने के बाद हमें फिर दूसरे कार्यक्रम का इंतजार करना पड़ता है. हमारा मुख्य रोजगार करीब 15 से 20 साल से प्रभावित है. ऐसे में परिवार का खर्च चलाना आसान नहीं होता.
सरकार के आभारी लेकिन…
रंजीत नाथ बताते हैं कि हम सरकार से बस इतना चाहते हैं कि हमें साल में कम से कम 20 से 25 बार कार्यक्रम करने का मौका मिले. दिसंबर में गीता जयंती मेले और फरवरी में सूरजकुंड क्राफ्ट मेले जैसे आयोजनों में हमें काम मिलता है, लेकिन इतने कार्यक्रमों से पूरे साल का खर्च चलाना मुश्किल है. हम शादियों में भी बीन बजाते हैं. हमारा समूह देश के अलग-अलग हिस्सों में ही नहीं, बल्कि विदेशों तक कार्यक्रम करने जा चुका है. हमारे बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं और उनकी पढ़ाई का खर्च भी हमें ही उठाना पड़ता है. हमारी सरकार से एक और अपील है कि जिस तरह मनरेगा के तहत ग्रामीण परिवारों को रोजगार की गारंटी मिलती है, उसी तरह कलाकारों के लिए भी कम से कम 100 दिन के काम की व्यवस्था होनी चाहिए. इससे हमें बार-बार काम की तलाश में भटकना नहीं पड़ेगा. हम सरकार के आभारी हैं कि वह हमें मेलों में बुलाती है, लेकिन अगर नियमित काम मिले, तो हमारी जिंदगी थोड़ी आसान हो सकती है.
अब आगे क्या
रंजीत नाथ बताते हैं कि हम यहां लोगों को हंसाने आते हैं, लेकिन हमारे अपने जीवन में भी कई परेशानियां हैं. मेला खत्म होने के बाद हमें फिर अपने गांव लौटना है और अगले कार्यक्रम का इंतजार करना है. हमारी बस यही मांग है कि हमारी कला जिंदा रहे और हमें इतना काम मिलता रहे कि हम अपने बच्चों को पढ़ा सकें और परिवार का पेट पाल सकें.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…







