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Faridabad ki local news : करवा चौथ और अहोई अष्टमी पर मिट्टी के करवे और दीये बेचने वाले कुम्हारों का कारोबार इस बार मंदा है. महंगी मिट्टी, बढ़ती लागत और ग्राहकों के मोलभाव ने उनकी परेशानी बढ़ा दी है. कुम्हारों का कहना है कि मेहनत के बावजूद कमाई नहीं हो रही है. उन्हें डर है कि आने वाली पीढ़ी इस पुश्तैनी काम से दूर हो जाएगी. लोकल 18 से बुलबुल गोला बताती हैं कि इस बार कारोबार काफी मंदा है. महंगाई बढ़ने से परेशानी हो रही है. रंग वाला करवा 50 रुपये का है, लेकिन ग्राहक 30 या 40 रुपये में मांगते हैं. दीया एक रुपये का है, लेकिन ग्राहक 10 रुपये में 15 मांगते हैं.
फरीदाबाद. त्योहारों पर दूसरों के घर रोशनी करने वाले कुम्हारों के अपने घरों में इस बार चिंता छाई हुई है. करवा चौथ और अहोई अष्टमी पर मिट्टी के करवे और दीये बेचकर अच्छी कमाई की उम्मीद थी, लेकिन बाजार में बिक्री कम होने से उनकी परेशानी बढ़ गई है. दिनभर मेहनत करके मिट्टी के बर्तन बनाना, उन्हें पकाना और बाजार तक पहुंचाना आसान नहीं है. ऊपर से मिट्टी महंगी हो गई है और ग्राहक सामान खरीदते समय कीमत कम कराने में लगे रहते हैं. कुम्हारों का कहना है कि अगर यही हाल रहा, तो आने वाली पीढ़ी इस पुश्तैनी काम को छोड़ देगी. लोकल 18 से बुलबुल गोला बताती हैं कि बल्लभगढ़ के कुम्हार मोहल्ले में रहती हूं. मिट्टी के बर्तन बनाना ही मेरा काम है. इस बार कारोबार काफी मंदा है. पिछले साल बिक्री अच्छी थी. महंगाई बढ़ने से परेशानी हो रही है. मिट्टी लाने से लेकर बर्तन तैयार करने और उन्हें पकाने तक काफी समय और मेहनत लगती है. इसके बावजूद बिक्री अच्छी नहीं हो रही है. जितनी मेहनत करते हैं, उसके हिसाब से कमाई नहीं हो पा रही है.
औने पौने दाम पर मांग रहे ग्राहक
लाडो देवी बताती हैं कि मैं मिट्टी के बर्तन बेचती हूं. इस बार काम बहुत धीमा चल रहा है. बिक्री पहले के मुकाबले काफी कम हो गई है. महंगाई भी बहुत बढ़ गई है. रंग वाला करवा 50 रुपये का है, लेकिन ग्राहक 30 या 40 रुपये में मांगते हैं. बिना रंग वाला करवा 30 रुपये का है, फिर भी कोई 10 रुपये तो कोई 20 रुपये देने की बात करता है. दीया एक रुपये का है, लेकिन ग्राहक 10 रुपये में 15 दीये मांगते हैं. इतनी कम कीमत पर सामान बेचने से हमारा खर्च निकालना मुश्किल हो जाता है. यही हाल रहा, तो आने वाले समय में शायद कोई इस काम को करना भी पसंद नहीं करेगा.
ऊषा देवी बताती हैं कि इस बार गलियों में भी बिक्री नहीं हो रही है. बाजार में ही कुछ सामान बिक रहा है. ग्राहक सामान खरीदने आते हैं, लेकिन सभी को सस्ता चाहिए. हम इतनी कम कीमत पर सामान नहीं दे सकते, क्योंकि इससे हमारा खर्च भी पूरा नहीं हो पाता है. हम अपनी दुकान पर रोज मिट्टी के बर्तन और दूसरे सामान रखते हैं, लेकिन मेहनत के बावजूद कारोबार में पहले जैसी कमाई नहीं है. त्रिवेणी देवी बताती हैं कि मैं बल्लभगढ़ के कुम्हार मोहल्ले की रहने वाली हूं. हम मिट्टी के बर्तन खुद भी बनाते हैं और तैयार सामान खरीदकर भी बेचते हैं. ग्राहक करवे और दीयों के दाम कम करवाते हैं. मिट्टी के बर्तन बनाने में मेहनत और खर्च दोनों लगते हैं, लेकिन बाजार में कम कीमत मिलने से हमारा मुनाफा घट रहा है.
कुम्हारों का कहना है कि पहले मिट्टी के बर्तन बनाने और बेचने का काम मुख्य रूप से उनके परिवार करते थे, लेकिन अब दूसरे लोग भी बाजार में मिट्टी के सामान बेचने लगे हैं. इससे कारोबार बंट गया है. महंगी मिट्टी, ज्यादा मेहनत और कम कमाई के कारण नई पीढ़ी भी इस काम में दिलचस्पी नहीं ले रही है. कुम्हारों को डर है कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो उनके बच्चे इस पुश्तैनी काम को आगे नहीं बढ़ाएंगे.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…









