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Faridabad ki local news : फरीदाबाद के कोट गांव की अरावली पहाड़ियों में पाषाण काल से जुड़े कई निशान मिले हैं. यहां हाथ-पैरों के निशान, पशु-पक्षियों की आकृतियां, मेगालिथिक स्टोन और पुराने पत्थर के औजार पाए गए. 27 सेंटीमीटर का हैंड प्रिंट भी सामने आया है. पुरातत्व विभाग से जुड़े तेजवीर मावी लोकल 18 से बताते हैं कि इन अवशेषों से हजारों साल पहले यहां रहने वाले लोगों की जीवनशैली और गतिविधियों को समझने में मदद मिलती है. इन निशानों को देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस इलाके में उस समय मानव की गतिविधियां लंबे समय तक रही होंगी. पत्थरों से जुड़े इन अवशेषों के जरिए यह जानने की कोशिश की जा सकती है कि उस दौर में लोग किस तरह शिकार करते थे.
फरीदाबाद के कोट गांव की अरावली पहाड़ियों में पाषाण काल से जुड़े कई निशान मिले हैं. ये निशान आदिमानवों के हाथ और पैरों के बताए जा रहे हैं. इन निशानों से उस समय यहां रहने वाले लोगों की जिंदगी के बारे में काफी जानकारी मिलती है. पत्थरों पर बने अलग-अलग निशान और आकृतियां इस इलाके के पुराने इतिहास की कहानी बताते हैं. इन खोजों की वजह से कोट गांव की पहाड़ियों को इतिहास और पुरातत्व की नजर से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
पुरातत्व विभाग से जुड़े तेजवीर मावी लोकल 18 से बताते हैं कि पाषाण काल में मानव काफी हद तक पत्थरों पर निर्भर था. शिकार के लिए पत्थरों से बनाए गए औजारों का इस्तेमाल किया जाता था. रहने के लिए गुफाएं उनके लिए आश्रय का काम करती थीं. अरावली की पहाड़ियों में हुए उत्खनन और यहां मिले अवशेषों से उस समय की जीवनशैली के बारे में जानकारी सामने आती है. इन जगहों पर मानव द्वारा बनाई गई कलाकृतियों और पत्थरों पर किए गए काम के निशान भी मिले हैं.
तेजवीर मावी के मुताबिक, कोट गांव की पहाड़ियों में कई जगह ऐसे पत्थर मिले हैं, जो करीब 4 से 5 फीट तक जमीन के अंदर दबे हुए हैं. राजस्थान में 15 फीट तक ऊंचे मेनहिर भी मिले हैं. कोट में मिले पत्थरों पर कई तरह की आकृतियां दिखाई देती हैं. इनमें पशु-पक्षियों और कुत्तों की कार्विंग भी शामिल हैं. इन निशानों को देखकर अंदाजा लगाया जा रहा है कि इस इलाके में उस समय मानव की गतिविधियां लंबे समय तक रही होंगी.
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कोट गांव की पहाड़ियों में कुछ मेगालिथिक स्टोन गोल घेरे के रूप में भी मिले हैं. इन गोल घेरों के बीच रखी बड़ी चट्टानों पर अलग-अलग तरह के पदचिह्न उकेरे गए हैं. इनमें पुरुष, महिला, बच्चों और जानवरों के पैरों के निशान बताए गए हैं. पत्थरों पर बने ये निशान उस दौर के लोगों की गतिविधियों को समझने में मदद करते हैं. इन संरचनाओं को देखकर यह जगह सामान्य पहाड़ी क्षेत्र से अलग नजर आती है.
तेजवीर मावी कहते हैं कि पहले मुझे करीब 23 सेंटीमीटर तक के हाथों के निशान मिले थे, लेकिन अब 27 सेंटीमीटर का बड़ा हैंड प्रिंट भी मिला है. इससे पहले ज्यादातर 19 से 22 सेंटीमीटर के निशान देखने को मिले थे. हाथों के निशानों के आकार में यह अंतर भी खास माना जा रहा है. उनके मुताबिक, इससे यह संभावना सामने आती है कि अलग-अलग समय में इन निशानों को बनाने का तरीका बदलता रहा होगा. इस पर आगे अध्ययन की जरूरत है.
कोट गांव की पहाड़ियों में पाषाण काल के औजार और दूसरे अवशेष भी मिलने की बात सामने आई है. ये चीजें उस समय के लोगों के रहन-सहन और उनके रोजमर्रा के काम को समझने में मदद कर सकती हैं. पत्थरों से जुड़े इन अवशेषों के जरिए यह जानने की कोशिश की जा सकती है कि उस दौर में लोग किस तरह शिकार करते थे और किन चीजों का इस्तेमाल करते थे. ऐसे अवशेष इलाके के पुराने इतिहास को समझने के लिए काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
कोट गांव की इन पहाड़ियों में इतिहास और पुरातत्व से जुड़ी पढ़ाई करने वाले छात्र भी आते रहते हैं. यहां मौजूद पत्थर, आकृतियां और पुराने अवशेष उनके लिए पढ़ाई को करीब से समझने का मौका देते हैं. किताबों में पढ़े जाने वाले पाषाण काल से जुड़े विषयों को छात्र यहां आकर देख सकते हैं. इस वजह से यह जगह केवल पुरातात्विक नजर से ही नहीं, बल्कि विद्यार्थियों के लिए भी उपयोगी मानी जा रही है. यहां आने वाले छात्रों को पुराने इतिहास को समझने में मदद मिलती है.
कोट गांव की अरावली पहाड़ियों में मिले पाषाण काल से जुड़े पत्थर, निशान, औजार और दूसरे अवशेष पुराने इतिहास की अहम कड़ी हैं. इनका सही तरीके से संरक्षण और अध्ययन किया जाए तो इस इलाके के इतिहास के बारे में और जानकारी सामने आ सकती है. तेजवीर मावी का कहना है कि पुरातत्व विभाग और सरकार को इस स्थान के महत्व को समझते हुए जरूरी कदम उठाने चाहिए. अगर इन अवशेषों को सुरक्षित रखा जाता है तो आने वाली पीढ़ियां भी इस विरासत को देख और समझ सकेंगी.












