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Ambala News : अंबाला छावनी के हाथीखाना इलाके में सब्जी उगाने वाले किसानों पर आफत टूट पड़ी है. तेज धूप, कम बारिश और लगातार चल रही गर्म हवाओं की वजह से अब किसान मुनाफे की नहीं, सिर्फ लागत निकलने की दुआ कर रहे हैं. सबसे ज्यादा नुकसान अरबी की फसल को हुआ है. करीब 40 साल से सब्जी की खेती कर रहे किसान बाबूराम लोकल 18 से बताते हैं कि हमने अपनी पूरी जिंदगी इसी मिट्टी में गुजारी है. इस बार धूप इतनी तेज रही कि अरबी की फसल लगभग खत्म हो गई. किसान संजय कुमार बताते हैं कि खेतों में तोरी की बेलें अभी हरी दिखाई देती हैं, लेकिन उनके फूल बार-बार झड़ रहे हैं.
अंबाला. खेत में खड़ा किसान जब हर सुबह अपनी फसल को देखता है, तो उसे सिर्फ पौधे नहीं दिखाई देते, बल्कि उन पौधों में अपने बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और पूरे सीजन की उम्मीद नजर आती है. लेकिन इस बार अंबाला छावनी के कैलाश मंदिर, हाथीखाना क्षेत्र के पास सब्जी उगाने वाले किसानों के लिए वही खेत चिंता का कारण बन गए हैं. तेज धूप, कम बारिश और लगातार चल रही गर्म हवाओं ने उनकी मेहनत पर ऐसा असर डाला है कि अब किसान मुनाफे की नहीं, सिर्फ लागत निकलने की दुआ कर रहे हैं. किसानों का कहना है कि इस बार मौसम ने सब्जी की खेती को बुरी तरह प्रभावित किया है. सबसे ज्यादा नुकसान अरबी की फसल को हुआ है, क्योंकि हर साल जुलाई तक अरबी की फसल अच्छी तरह तैयार हो जाती थी. इस बार तेज सूरज की तपिश ने पौधों को सूखा दिया है ओर खेतों में कई जगह अरबी के पत्ते पीले पड़ चुके हैं, पौधों की बढ़वार रुक गई है.
चार बीघा जमीन
करीब 40 साल से सब्जी की खेती कर रहे किसान बाबूराम लोकल 18 से बताते हैं कि हमने अपनी पूरी जिंदगी इसी मिट्टी में गुजारी है. अरबी, पालक, घीया, तोरी, मिर्च और भिंडी को हमेशा देसी तरीके से उगाया है. गोबर और देसी खाद डालकर फसल तैयार की जाती है, लेकिन इस बार धूप इतनी तेज रही कि अरबी की फसल लगभग खत्म हो गई. बाबूराम का कहना है कि उन्होंने लगभग चार बीघा जमीन पर अलग-अलग सब्जियां लगाई थीं, जिसमें बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई पर लगातार खर्च होता रहा, लेकिन अब उन्हें डर है कि मंडी तक पहुंचने से पहले ही फसल की पैदावार इतनी कम हो रही है कि लागत निकालना भी मुश्किल हो जाएगा. अब वह सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं.
पैदावार पहले जैसी नहीं
किसान संजय कुमार बताते हैं कि खेतों में तोरी की बेलें अभी हरी दिखाई देती हैं, लेकिन उनके फूल बार-बार झड़ रहे हैं. तेज हवाओं के कारण फूल टिक नहीं पा रहे, जिससे फल बनने की प्रक्रिया प्रभावित हो रही है. तोरी को तैयार होने में करीब एक महीना लगता है और इसकी खेती तीन महीने तक चलती है. इस समय रोजाना 12 से 15 किलो तोरी निकल रही है, जो मंडी में बिक जाती है, लेकिन पैदावार पहले जैसी नहीं रही है. संजय का कहना है कि इस बार खेती में करीब 50 हजार रुपये का खर्च आ चुका है, जिसमें मिर्च और अरबी की फसल लगभग खराब हो चुकी है, जबकि भिंडी और तोरी भी मौसम के भरोसे है. संजय कहते हैं कि अब वह हर बादल को उम्मीद से देखते हैं, लेकिन उन्हें यह भी डर है कि अगर अचानक बहुत ज्यादा बारिश हुई तो बची हुई फसल भी नुकसान झेल सकती है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें











