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Ambala ki local news : अंबाला के वात्सल्य स्कूल फॉर स्पेशल चिल्ड्रन में दिवाली कार्निवल ने लोगों की दिल जीत लिया है. इस कार्निवल में दिव्यांग बच्चों ने खुद के बनाए दिवाली कार्ड, मिट्टी के दीये, कैंडल, बंधनवार, शगुन के लिफाफे और पेपर बैग प्रदर्शनी में बिक्री के लिए रखे. कार्निवल में बच्चों की मेहनत की कहानी हर किसी का दिल जीतती नजर आई है. स्पेशल चाइल्ड तांशू ने लोकल 18 को बताया कि आज जब लोग उनकी बनाई मोमबत्तियां खरीदने के लिए पहुंच रहे हैं तो उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है. उनके लिए यह उनकी मेहनत को मिली पहचान और प्रोत्साहन है. नैतिक के मुताबिक, उन्होंने बंधनवार, डिजाइनिंग वाले दीये और मोमबत्तियां बनाई थीं, जो प्रदर्शनी में बिक चुकी हैं.
अंबाला. दिवाली खुशियों, रोशनी और अपनों के साथ प्यार बांटने का पर्व है. इस त्योहार पर हर कोई अपने घर को सजाने और बाजार से खूबसूरत सामान खरीदने में जुटा है, लेकिन अंबाला में इस बार दिवाली की रौनक कुछ अलग ही देखने को मिली. यहां कुछ नन्हे हाथों ने सिर्फ दीये और मोमबत्तियां ही नहीं बनाईं, बल्कि अपने सपनों को उड़ान देने की कोशिश भी की है. इन बच्चों की मेहनत से तैयार सामान की जब लोगों ने खरीदारी की तो उनके चेहरों पर जो खुशी दिखाई दी, वह किसी भी त्योहार की सबसे खूबसूरत रोशनी से कम नहीं थी. दिवाली से पहले अंबाला के वात्सल्य स्कूल फॉर स्पेशल चिल्ड्रन में दिवाली कार्निवल का आयोजन किया गया है. इस कार्निवल में विशेष बच्चों ने अपनी मेहनत और हुनर से तैयार किए गए दिवाली कार्ड, मिट्टी के दीये, कैंडल, बंधनवार, शगुन के लिफाफे और पेपर बैग प्रदर्शनी में बिक्री के लिए रखे. इन सभी वस्तुओं को बच्चों ने अपने अध्यापकों के मार्गदर्शन में खुद तैयार किया. जैसे-जैसे लोग प्रदर्शनी में पहुंचे और बच्चों के हाथों से बने सामान की खरीदारी की, वैसे-वैसे बच्चों का उत्साह भी बढ़ता चला गया.
पहचान भी, प्रोत्साहन भी
इस कार्निवल में बच्चों की मेहनत की कहानी हर किसी का दिल जीतती नजर आई है. स्पेशल चाइल्ड तांशू ने लोकल 18 को बताया कि उन्होंने अपने अध्यापकों की मदद से करीब चार महीने की मेहनत के बाद मोमबत्तियां तैयार की हैं. आज जब लोग उनकी बनाई मोमबत्तियां खरीदने के लिए पहुंच रहे हैं तो उन्हें बहुत अच्छा लग रहा है. उनके लिए यह सिर्फ सामान की बिक्री नहीं, बल्कि उनकी मेहनत को मिली पहचान और प्रोत्साहन है. नैतिक ने बताया कि उन्होंने बंधनवार, डिजाइनिंग वाले दीये और मोमबत्तियां बनाई थीं, जो प्रदर्शनी में बिक चुकी हैं. नंदिनी ने बताया कि उन्होंने शगुन के लिफाफे, पेपर बैग और कैंडल तैयार की हैं.
वात्सल्य स्कूल के प्रिंसिपल यशपाल बताते हैं कि यह स्कूल विशेष बच्चों के लिए शुरू किया गया है. स्कूल का मुख्य उद्देश्य इन बच्चों की प्रतिभा को पहचानना और उन्हें इस काबिल बनाना है कि वे भविष्य में अपने पैरों पर खड़े हो सकें. हर बच्चे के अंदर कोई न कोई खास खूबी होती है, जरूरत सिर्फ उस खूबी को पहचानने और उसे निखारने की होती है. दिवाली कार्निवल के जरिए बच्चों को अपनी बनाई चीजें लोगों के सामने प्रदर्शित करने और बेचने का मौका दिया गया है. इससे बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है और उन्हें अपनी मेहनत की कीमत समझ आती है. स्कूल चाहता है कि जब ये बच्चे पढ़ाई पूरी करके बाहर निकलें तो इनके पास हुनर के साथ-साथ अपनी आजीविका कमाने का विकल्प भी मौजूद हो.
चेहरों पर दिखाई दी खुशी
कंटोनमेंट बोर्ड के सदस्य अजय बवेजा ने बताया कि इन बच्चों को आगे बढ़ाने और प्रोत्साहित करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. बच्चों की मेहनत और उनके चेहरों पर दिखाई दे रही खुशी देखकर उन्हें बेहद प्रसन्नता हुई. वात्सल्य स्कूल की शुरुआत वर्ष 2014 में एक छोटे से प्रयास के रूप में हुई थी. आज यहां के कई विशेष बच्चे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं. कभी लगाया गया छोटा सा पौधा आज एक बड़े मुकाम तक पहुंच रहा है और ये बच्चे अपनी उपलब्धियों से अंबाला का नाम रोशन कर रहे हैं. कंटोनमेंट बोर्ड के CEO राहुल आनंद ने बताया कि इन बच्चों को बेहतर भविष्य देने और आत्मनिर्भर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं. आम लोगों से अपील की कि वे स्कूल में आकर बच्चों के हाथों से तैयार की गई वस्तुओं को खरीदें, ताकि बच्चों को प्रोत्साहन मिले और उनका आत्मविश्वास बढ़े.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…









