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Dharti Dhaba Ambala : इस ढाबे की कहानी उतनी ही दिलचस्प है, जितना इसका स्वाद है. इस ढाबे की सबसे बड़ी पहचान इसका तीन फीट जमीन के नीचे बना तंदूर है. इसी वजह से पूरे अंबाला में इसे धरती ढाबा के नाम से जाना जाता है. लोकल 18 से ढाबा संचालक संजीव कुमार बताते हैं कि समय बदला, बाजार बदला, महंगाई बढ़ी, लेकिन उन्होंने कभी अपने ढाबे की पहचान और लोगों की पहुंच से भोजन को दूर नहीं होने दिया. आज जब शहर में एक सामान्य थाली की कीमत 100 रुपये या उससे अधिक हो चुकी है, तब भी उनके यहां मात्र 40 रुपये में चार रोटियां, देसी सब्जी और सलाद दिया जाता है. ढाबे में तैयार होने वाले भोजन में देसी मसालों और घरेलू तरीके का इस्तेमाल किया जाता है.
अंबाला. हरियाणा के अंबाला छावनी के कच्चा बाजार की गलियों में एक ऐसा ढाबा है, जहां सिर्फ रोटियां नहीं सिकतीं, बल्कि बीते पांच दशकों से लोगों का भरोसा, अपनापन और इंसानियत भी हर दिन ताजा होती है. बढ़ती महंगाई के दौर में जहां बाहर खाना आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है, करीब 50 साल पुराना धरती वैष्णो ढाबा आज भी महज 40 रुपये में भरपेट भोजन परोसकर गरीब, मजदूर और मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए उम्मीद बना हुआ है. इस ढाबे की सबसे बड़ी पहचान इसका तीन फीट जमीन के भीतर बना तंदूर है, जिसकी वजह से ही इसे पूरे शहर में “धरती ढाबा” के नाम से जाना जाता है. इस ढाबे की कहानी भी उतनी ही दिलचस्प है, जितना इसका स्वाद है.
इतनी कम कीमत क्यों?
लोकल 18 से ढाबा संचालक संजीव कुमार बताते हैं कि इस ढाबे की शुरुआत उनकी बुआ फूला देवी ने करीब 50 वर्ष पहले की थी. इसके बाद उनके पिता ने इस विरासत को आगे बढ़ाया और अब वह खुद इसे संभाल रहे हैं. संजीव का कहना है कि समय बदला, बाजार बदला, महंगाई बढ़ी, लेकिन उन्होंने कभी अपने ढाबे की पहचान और लोगों की पहुंच से भोजन को दूर नहीं होने दिया. संजीव बताते हैं कि आज जब शहर में एक सामान्य थाली की कीमत 100 रुपये या उससे अधिक हो चुकी है, तब भी उनके यहां मात्र 40 रुपये में चार रोटियां, देसी सब्जी और सलाद दिया जाता है. उनका मानना है कि मजदूरी करने वाला व्यक्ति भी सम्मान के साथ भरपेट भोजन कर सके, यही उनके परिवार की सबसे बड़ी कमाई है.
आटा लाओ, रोटी ले जाओ
इस ढाबे की एक और खास परंपरा आज भी जीवित है. शहर के कई परिवार अपने घर से आटा लेकर यहां पहुंचते हैं और जमीन के भीतर बने तंदूर में अपनी रोटियां सिकवाकर ले जाते हैं. संजीव कुमार बताते हैं कि तंदूर की गर्माहट और पारंपरिक तरीके से बनी करारी रोटियों का स्वाद लोगों को कहीं और नहीं मिलता हैं. ढाबे में तैयार होने वाले भोजन में देसी मसालों और घरेलू तरीके का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे स्वाद के साथ सेहत का भी पूरा ध्यान रखा जाता है.
अठन्नी से 5 रुपये तक
ढाबे के पुराने ग्राहक पप्पू ने लोकल 18 से बताते हैं कि वह पिछले 40 साल से यहां का खाना खा रहे हैं. एक समय ऐसा था, जब वह अठन्नी में यहां रोटी खा लेते थे. आज भी पांच रुपये में एक रोटी मिल जाती है. पप्पू के अनुसार, बचपन का जो स्वाद उन्होंने यहां चखा था, वही स्वाद आज भी बरकरार है. कई बार वह घर से आटा लेकर आते हैं और यहीं से करारी तंदूरी रोटियां बनवाकर घर ले जाते हैं. अंबाला छावनी तेजी से आधुनिक हो रहा है, पुराने स्वाद और परंपराएं धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं, लेकिन ऐसे समय में धरती वैष्णो ढाबा केवल एक भोजनालय नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक विरासत, देसी स्वाद और सामाजिक संवेदनशीलता की जीवंत मिसाल बनकर खड़ा है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें











