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Faridabad News: फरीदाबाद के दयालपुर गांव के किसानों का आरोप है कि बाजरा और ज्वार पर मिलने वाली करीब 7 हजार रुपये प्रति एकड़ सब्सिडी गलत फसल रिकॉर्ड के कारण नहीं मिल रही. किसानों का कहना है कि पटवारी खेतों का मौके पर सत्यापन नहीं करते, जिससे रिकॉर्ड में दूसरी फसल दर्ज हो जाती है और उन्हें सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल पाता.
फरीदाबाद: खेत में दिन-रात पसीना बहाने वाला किसान हर मौसम में उम्मीद के साथ फसल बोता है. कभी बारिश की चिंता, कभी लागत का बोझ और कभी फसल के सही दाम की परेशानी उसके साथ बनी रहती है. ऐसे में अगर सरकार की ओर से मिलने वाली सब्सिडी भी समय पर न मिले, तो किसान की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं.
फरीदाबाद के दयालपुर गांव के किसान भी कुछ ऐसी ही परेशानी से गुजर रहे हैं. उनका कहना है कि बाजरा और ज्वार जैसी फसलों पर मिलने वाली सब्सिडी अब उन्हें नहीं मिल रही है. इसके पीछे सबसे बड़ी वजह सरकारी रिकॉर्ड में फसल का गलत विवरण दर्ज होना बताया जा रहा है. किसानों का कहना है कि वे लगातार अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पा रहा है.
7 हजार रुपये प्रति एकड़ सब्सिडी
किसान संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि उन्होंने Local18 से बातचीत में कहा कि मैं फरीदाबाद के दयालपुर गांव का रहने वाला हूं. सरकार बाजरा और ज्वार की फसल पर करीब 7 हजार रुपये प्रति एकड़ सब्सिडी देने की बात करती है, लेकिन यह पैसा किसान तक ठीक तरीके से पहुंच ही नहीं पाता. सब्सिडी लेने के लिए पटवारी के चक्कर लगाने पड़ते हैं. अगर किसान को यह राशि सही समय पर और बिना परेशानी के मिल जाए, तो उसे काफी राहत मिलेगी और किसान बाजरा, ज्वार जैसी फसलों की खेती करने के लिए भी आगे आएगा.
किसान तक नहीं पहुंचती सब्सिडी
संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि सबसे बड़ी परेशानी सरकारी रिकॉर्ड में फसल गलत दर्ज होने की है. कई बार खेत में बाजरा या ज्वार की बुवाई की होती है, लेकिन रिकॉर्ड में धान चढ़ा दिया जाता है. इसके कारण किसान सब्सिडी से वंचित रह जाता है. फिर पटवारी के चक्कर लगाने पड़ते हैं. मंडी में रजिस्ट्रेशन कराना पड़ता है, लेकिन इसके बाद भी किसान तक सब्सिडी नहीं पहुंचती. अगर सही रिकॉर्ड बने और सब्सिडी समय पर मिले तो किसानों को काफी राहत मिलेगी.
किसान संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि बाजरे की खेती में बहुत ज्यादा खर्च नहीं आता. एक एकड़ में बीज का खर्च करीब 500 से 700 रुपये तक होता है और कुल लागत करीब 2500 से 3000 रुपये के बीच आती है. सरकार की ओर से योजनाओं की घोषणा तो कर दी जाती है, लेकिन किसान को उसका लाभ नहीं मिल पाता. ऐसे में किसान खुद को ठगा हुआ महसूस करता है.
रिकॉर्ड में दर्ज कर दी गई दूसरी फसल
किसान संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि फसल का रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन होता है और नियम के अनुसार पटवारी को खेत में आकर यह देखना चाहिए कि किसान ने कौन-सी फसल बोई है. लेकिन उनका आरोप है कि अब पटवारी खेतों में आते ही नहीं हैं. वह दफ्तर में बैठकर ही रिकॉर्ड अपडेट कर देते हैं. कई बार किसान ने भिंडी बो रखी होती है, लेकिन रिकॉर्ड में दूसरी फसल दर्ज कर दी जाती है. वहीं जहां बाजरा लगाया होता है वहां धान चढ़ा दिया जाता है. इसी वजह से किसानों को सब्सिडी नहीं मिल पाती.
संजीव कुमार बैंसला बताते हैं कि पहले ऐसा नहीं था. करीब 10 साल पहले पटवारी खुद खेतों में आते थे. किसानों से पूछते थे कि कौन-सी फसल बोई गई है और मौके पर जांच करने के बाद ही रिकॉर्ड तैयार किया जाता था. लेकिन अब यह व्यवस्था पूरी तरह बदल गई है. पिछले करीब 10 साल से यही समस्या चली आ रही है. किसान चाहते हैं कि अधिकारी दोबारा खेतों में आकर सही सर्वे करें, ताकि सरकारी रिकॉर्ड सही बने और जिन किसानों का हक है, उन्हें समय पर सब्सिडी मिल सके.
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आर्यन सेठ, News18 Hindi में डिजिटल डेस्क पर जुड़े हैं और जनवरी 2026 से उत्तर प्रदेश की राजनीति, अपराध, प्रशासन, वायरल और अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर खबरें लिखते हैं. जामिया मिलिया इस्लामिया दिल्ल…और पढ़ें











