क्या आपका बच्चा खेलते-खेलते जल्दी थक जाता है? इसे सिर्फ कमजोरी समझना घातक, जानिए वजह

On: July 15, 2026 3:39 AM
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फरीदाबाद. बच्चों का खेलना-कूदना उनकी अच्छी सेहत की निशानी माना जाता है, लेकिन अगर आपका बच्चा थोड़ी देर खेलने के बाद ही थक जाता है. बार-बार उसकी सांस फूलने लगती है. दूध पीते समय जल्दी थक जाता है या उसकी उम्र के हिसाब से वजन और लंबाई नहीं बढ़ रही है, तो इसे सिर्फ कमजोरी मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. कई बार ऐसे लक्षण जन्मजात दिल की बीमारी (कंजेनिटल हार्ट डिजीज) की ओर इशारा करते हैं. समय पर जांच और सही इलाज मिलने पर ज्यादातर बच्चों का सफल इलाज संभव है और वे सामान्य जीवन जी सकते हैं. लोकल 18 से फरीदाबाद में बच्चों के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशीष बताते हैं कि अगर कोई बच्चा खेलते-खेलते जल्दी थक जाता है तो इसका मतलब हमेशा दिल की बीमारी नहीं होता. सबसे पहले दूसरे कारणों की भी जांच की जाती है. लेकिन जल्दी थक जाना दिल की बीमारी का एक अहम लक्षण भी हो सकता है. कई माता-पिता बताते हैं कि परिवार के दूसरे बच्चे खूब दौड़ते और खेलते हैं, लेकिन एक बच्चा उतनी देर तक नहीं खेल पाता और जल्दी थक जाता है. ऐसे मामलों में दिल की जांच कराने की जरूरत पड़ सकती है.

डॉ. आशीष बताते हैं कि एक साल से छोटे बच्चों में भी कुछ ऐसे संकेत होते हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. अगर बच्चा दूध पीते-पीते जल्दी थक जाए, कुछ देर रुककर फिर दूध पीना शुरू करे या दूध पीते समय ज्यादा मेहनत करता हुआ दिखाई दे तो यह जन्मजात दिल की बीमारी का संकेत हो सकता है. अगर बच्चे की सांस सामान्य से तेज चल रही हो, उसका वजन और लंबाई उम्र के हिसाब से नहीं बढ़ रहे हों या बार-बार सर्दी, खांसी और निमोनिया हो रहा हो तो भी डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए.

ये गंभीर संकेत

डॉ. आशीष बताते हैं कि अगर किसी बच्चे का शरीर या होंठ नीले पड़ने लगें तो यह गंभीर संकेत माना जाता है. ऐसे बच्चों की तुरंत जांच करानी चाहिए क्योंकि कई बार यह जन्मजात दिल की बीमारी का लक्षण होता है. समय पर इलाज शुरू होने से बच्चे की स्थिति बेहतर की जा सकती है. हर जन्मजात दिल की बीमारी जन्म के समय पकड़ में नहीं आती. कुछ बच्चों में बीमारी के लक्षण बाद में दिखाई देते हैं. अगर बच्चा जन्म के समय या उसके बाद नीला दिखाई दे, सांस लेने में दिक्कत हो या दूसरे लक्षण नजर आएं तो डॉक्टर की सलाह लेकर जरूरी जांच करानी चाहिए. समय पर बीमारी की पहचान होने से इलाज आसान हो जाता है.

केवल एक ही पंप

डॉ. आशीष बताते हैं कि आज के समय में जन्मजात दिल की ज्यादातर बीमारियों का सफल इलाज संभव है. हालांकि कुछ बच्चों में दिल पूरी तरह विकसित नहीं होता. सामान्य तौर पर दिल में दो पंप होते हैं, लेकिन कुछ बच्चों में केवल एक ही पंप बनता है. ऐसे मामलों में दिल को पूरी तरह सामान्य नहीं बनाया जा सकता, लेकिन ऑपरेशन और दूसरे इलाज की मदद से बच्चे की उम्र बढ़ाई जा सकती है और उसके लक्षणों को काफी हद तक कम किया जा सकता है. इलाज के बाद ज्यादातर बच्चे सामान्य जीवन जी सकते हैं. यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे को किस तरह की दिल की बीमारी है. आज चिकित्सा विज्ञान काफी आगे बढ़ चुका है और लगभग 95 प्रतिशत बच्चों का हार्ट सर्जरी के बाद अच्छा परिणाम देखने को मिलता है. ऐसे बच्चे पढ़ाई, खेल और सामान्य जीवन की अधिकांश गतिविधियां कर सकते हैं.

हार्ट स्क्रीनिंग से क्या

डॉ. आशीष बताते हैं कि हर बच्चे की अलग से हार्ट स्क्रीनिंग कराने की जरूरत नहीं होती क्योंकि यह बहुत व्यापक प्रक्रिया है. लेकिन जिन बच्चों में दिल की बीमारी के लक्षण दिखाई दें. उनकी जांच जरूर करानी चाहिए. हर बच्चे का जन्म किसी स्वास्थ्य केंद्र या अस्पताल में होना चाहिए. जन्म के तुरंत बाद बच्चे का ऑक्सीजन सैचुरेशन, हार्ट रेट और दूसरी जरूरी जांच की जानी चाहिए ताकि अगर कोई समस्या हो तो शुरुआत में ही उसका पता चल सके. डॉ. आशीष बताते हैं कि परिवार की योजना बनाते समय मां की सेहत का विशेष ध्यान रखना चाहिए. मां की उम्र कम से कम 20 साल होनी चाहिए और जहां तक संभव हो 35 से 40 साल की उम्र के बाद गर्भधारण से बचना चाहिए. बहुत कम या ज्यादा उम्र में गर्भधारण करने से बच्चे में जन्मजात बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.

रूबेला संक्रमण से क्या लिंक

डॉ. आशीष बताते हैं कि गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के दौरान पौष्टिक भोजन लेना बहुत जरूरी है. बिना डॉक्टर की सलाह के कोई भी दवा नहीं लेनी चाहिए, क्योंकि कुछ दवाइयां गर्भ में पल रहे बच्चे के दिल के विकास पर असर डाल सकती हैं. मैने रूबेला वैक्सीन लगवाने की भी सलाह दी. अगर गर्भावस्था के दौरान मां को रूबेला संक्रमण हो जाए तो बच्चे में जन्मजात दिल की बीमारी होने का खतरा बढ़ सकता है.

ये सावधानियां बरतनी जरूरी

डॉ. आशीष के मुताबिक, प्रदूषण भी जन्मजात बीमारियों का एक कारण बन सकता है. खासकर फरीदाबाद जैसे शहरों में प्रदूषण का स्तर अधिक रहता है. अगर किसी परिवार के पास सुविधा हो तो गर्भधारण की योजना बनाने के बाद या गर्भावस्था के दौरान कुछ समय ऐसे स्थान पर रहना बेहतर हो सकता है, जहां प्रदूषण कम हो. सर्दियों में प्रदूषण बढ़ने पर एन-95 मास्क का इस्तेमाल करना भी फायदेमंद हो सकता है. गर्भावस्था के दौरान सिगरेट, तंबाकू और किसी भी तरह के नशे से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए. अगर मां को डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर है तो उसे नियंत्रण में रखना जरूरी है. इन सभी बातों का ध्यान रखने से जन्मजात दिल की बीमारी का खतरा काफी हद तक कम किया जा सकता है.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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