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who is Suresh Prasad : 70 साल के सुरेश प्रसाद को दिखाई नहीं देता, लेकिन बच्चों के लिए उनका प्यार आज भी कम नहीं हुआ. करीब एक महीने से वह फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में हैं. हैरानी की बात है कि बच्चे पास रहते हैं, फिर भी उनकी तलाश की कोई शिकायत सामने नहीं आई. आखिर बुजुर्ग पिता को अपनों का सहारा क्यों नहीं मिला. लोकल 18 से सुरेश प्रसाद बताते हैं कि उनके परिवार में बेटा, बहू और दो पोते हैं. तीन बेटे थे, जिसमें बड़े बेटे की मौत हो चुकी है. छोटा बेटा फरीदाबाद में रहता है. वृद्धाश्रम की संचालक अनीता मलिक बताती हैं कि अंकल जी को पुलिस वृद्धाश्रम में छोड़कर गई थी.
फरीदाबाद. मां-बाप अपने बच्चों को पाल पोसकर बड़ा करते हैं. उनकी हर जरूरत पूरी करने के लिए अपनी जिंदगी लगा देते हैं. लेकिन जिस उम्र में मां-बाप को बच्चों के सहारे की जरूरत होती है, उसी उम्र में अगर बच्चे उनका साथ छोड़ दें तो यह दर्द किसी भी माता-पिता के लिए बेहद तकलीफ देने वाला है. ऐसी ही एक कहानी बिहार के नालंदा जिले के रहने वाले 70 साल के सुरेश प्रसाद की है. सुरेश प्रसाद को बिल्कुल दिखाई नहीं देता है. जिस उम्र में बेटे को पिता का हाथ पकड़कर उन्हें सहारा देना चाहिए, उस उम्र में वह फरीदाबाद के सेक्टर 10 स्थित वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हैं. करीब एक महीने से घर से बाहर होने के बावजूद उनके बच्चों ने उन्हें तलाशने की कोशिश तक नहीं की. इसके बाद भी पिता अपने बच्चों की खुलकर बुराई नहीं करते हैं और कहीं न कहीं उनके बारे में अच्छा ही सोचते नजर आते हैं.
लोकल 18 से सुरेश प्रसाद बताते हैं कि मेरी उम्र 70 साल है. परिवार में बेटा, बहू और दो पोते हैं. मेरे तीन बेटे थे, जिसमें बड़े बेटे की मौत हो चुकी है. बीच वाला बेटा विकलांग है. छोटा बेटा फरीदाबाद में रहता है और गाड़ी चलाता है. मैं पहले मिठाई बनाने का काम करता था. मेरी पत्नी भी है और बेटा मजदूरी वगैरह करता है. मेरी दो बेटियां भी हैं. करीब एक महीने से मैं घर से बाहर हूं और अब फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में रह रहा हूं.
‘बेटा सही, लेकिन…’
सुरेश प्रसाद बताते हैं कि मैं अपने आप ही घर से निकल गया था. छोटा बेटा सही है लेकिन उसने मुझे अपने पास नहीं रखा. फरीदाबाद में मेरा बेटा रहता है. मेरी बेटी भी फरीदाबाद में ही रहती है. अब मैं भी फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में हूं. सुरेश प्रसाद अपनी जिंदगी और बच्चों के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बताते हैं. वह अपने बच्चों की कमियां बताने से भी बचते नजर आते हैं. उनकी बातों से ऐसा लगता है कि पिता होने के नाते वह आज भी अपने बच्चों के लिए अच्छा ही सोचते हैं. वृद्धाश्रम की संचालक अनीता मलिक बताती हैं कि अंकल जी को पुलिस वृद्धाश्रम में छोड़कर गई थी. इनके बच्चे फरीदाबाद में भी रहते हैं, लेकिन अभी तक किसी बच्चे ने इनकी मिसिंग कंप्लेंट नहीं दी है. मैंने अपने स्तर पर हर जगह पता किया है. जब अंकल जी बताते हैं कि उनका एक बेटा और एक बेटी फरीदाबाद में रहते हैं तो सवाल उठता है कि अगर करीब एक महीने से पिता घर से बाहर हैं तो बच्चों ने उनकी तलाश क्यों नहीं की.
खुलकर कुछ नहीं बताना चाहते
अनीता मलिक बताती हैं कि यहां कई ऐसे बुजुर्ग आते हैं जिनके बच्चे बाद में उन्हें देखने के लिए वृद्धाश्रम पहुंचते हैं. लेकिन अंकल जी को देखने के लिए अभी तक उनका कोई बच्चा नहीं आया है. मैं मिसिंग हेल्पलाइन भी चलाती हूं और जो लोग घर से खो जाते हैं उन्हें तलाशने का काम करती हूं. मैंने इनके बारे में भी पता किया है. अगर इनके बच्चों ने मिसिंग कंप्लेंट कराई होती तो उसका पता जरूर चलता, लेकिन अभी तक ऐसी कोई शिकायत सामने नहीं आई है. अनीता मलिक बताती हैं कि अंकल जी अपने बच्चों के बारे में खुलकर कुछ नहीं बताना चाहते हैं. वह अपने बेटे या बेटियों की ज्यादा बुराई नहीं करते हैं. एक पिता की यही मजबूरी और ममता इस पूरी कहानी को और भावुक बना देती है. जिन बच्चों को पाल पोसकर उन्होंने बड़ा किया, आज उन्हीं बच्चों से दूर वृद्धाश्रम में जिंदगी गुजार रहे हैं.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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