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Sugarcane Farming Faridabad : फरीदाबाद का दयालपुर गांव, जहां कभी 100 फीसदी किसान गन्ने की खेती करते थे, आज सिर्फ 30 प्रतिशत रह गए हैं. किसानों का कहना है कि कभी इसी खेती से घर चलता था और सोना खरीदा जाता था, आज कर्ज बढ़ रहा है. दयालपुर में गन्ने की खेती का रकबा लगातार कम होना सिर्फ एक फसल का खत्म होना नहीं है, बल्कि यह किसानों की बदलती हालत की कहानी भी है. कभी जिस खेती से गांव की पहचान थी, आज उसी खेती को करने वाले किसान गिने चुने रह गए हैं. लोकल 18 से किसान जितेंद्र बताते हैं कि खाद, बीज और खेती से जुड़ी दूसरी चीजों की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन गन्ने की कीमत ठहरी हुई है.
फरीदाबाद. कभी फरीदाबाद के दयालपुर गांव की पहचान ही गन्ने की खेती से हुआ करती थी. गांव में चारों तरफ गन्ने के खेत दिखाई देते थे और किसान इसी खेती से अपने घर का खर्च चलाने के साथ अच्छी कमाई भी कर लेते थे. लेकिन समय के साथ हालात ऐसे बदले कि जिस गांव में कभी करीब 100 फीसदी खेती गन्ने की होती थी, वहां अब मुश्किल से 30 फीसदी किसान ही गन्ना उगा रहे हैं. किसानों का कहना है कि लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन गन्ने का भाव उस हिसाब से नहीं बढ़ रहा है. यही वजह है कि धीरे-धीरे किसानों ने गन्ने की खेती से दूरी बनानी शुरू कर दी है. लोकल 18 से किसान जितेंद्र बताते हैं कि मैं 3 एकड़ जमीन में गन्ने की खेती कर रहा हूं. मेरे दादा और परदादा के समय से हमारे परिवार में गन्ने की खेती होती आ रही है. लेकिन अब इस खेती में पहले जैसा फायदा नहीं रहा है. खाद, बीज और खेती से जुड़ी दूसरी चीजों की लागत लगातार बढ़ रही है, लेकिन गन्ने की कीमत ठहरी हुई है. सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती रही है, लेकिन जमीन पर किसान की हालत देखकर ऐसा लगता नहीं है. किसान लगातार कर्ज में जा रहा है.
कितना होना चाहिए रेट
किसान जितेंद्र बताते हैं कि एक एकड़ गन्ने की खेती में करीब 30 हजार रुपये तक खर्च हो जाता है. इसमें खेत की तैयारी, बिजाई, कटाई, जुताई, पानी, खाद और मजदूरी का खर्च शामिल है. इसके बाद जब गन्ना तैयार होता है तो उसे मिल तक पहुंचाने का किराया भी किसान को ही देना पड़ता है. इतना खर्च करने के बाद किसान के हाथ में बचता ही क्या है. किसान इस समय इतनी परेशानी में है कि कई लोग अपनी जमीन तक बेचने को मजबूर हो रहे हैं. जितेंद्र बताते हैं कि जिस हिसाब से चीनी के भाव बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से गन्ने का रेट कम से कम 1000 रुपये प्रति क्विंटल होना चाहिए. अभी किसान को करीब 400 से 450 रुपये प्रति क्विंटल के आसपास रेट बताया जाता है, लेकिन किराया और दूसरे खर्च निकालने के बाद किसान के पास करीब 350 से 380 रुपये ही बचते हैं. कुछ साल पहले खेती से इतनी आमदनी हो जाती थी कि किसान अपने घर के लिए सोना तक खरीद लेता था, लेकिन आज खेती की कमाई से एक तोला सोना खरीदना भी मुश्किल हो गया है.
पूरे साल देखभाल
किसान जितेंद्र बताते हैं कि गन्ने की खेती आसान नहीं है. खेत की जुताई कई बार करनी पड़ती है. इसके बाद नलाई, बंधाई, खाद और पानी का खर्च आता है. करीब हर 15 दिन में खेत में पानी देना पड़ता है. पूरे साल फसल की देखभाल करनी पड़ती है और गन्ने में कई बार बंधाई भी करनी पड़ती है. यानी किसान की मेहनत पूरे साल चलती है, लेकिन जब फसल बेचने का समय आता है तो उसकी मेहनत के हिसाब से पैसा नहीं मिलता. गन्ने की पर्ची को लेकर भी किसानों को परेशानी होती है. हमारे गांव में गन्ने के सेंटर हैं और जब पर्ची आती है तभी किसान अपना गन्ना वहां डाल पाता है. कभी 10 दिन में पर्ची आती है तो कभी 15 दिन लग जाते हैं. इस दौरान मजदूरों को खाली बैठाकर भी पैसे देने पड़ते हैं. अगर पांच मजदूर भी काम पर लगाए जाएं तो एक मजदूर को करीब 500 से 600 रुपये रोज देना पड़ता है. पर्ची समय पर नहीं आने से किसान की लागत और बढ़ जाती है.
किसान जितेंद्र बताते हैं कि किसान चाहे गेहूं लगाए, धान लगाए या गन्ने की खेती करे, हर जगह खर्च बढ़ता जा रहा है. खेती से आमदनी उस हिसाब से नहीं बढ़ रही है. किसान बिजली का बिल तक समय पर नहीं भर पा रहा है. ऐसे हालात में किसान आखिर करे तो क्या करे.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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