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Radha Krishna Temple Nawada : फरीदाबाद के नवादा गांव में बांसुरी वाले राधा-कृष्ण का एक अनोखा मंदिर है, जिसका संबंध द्वापर युग से माना जाता है. यहां जेठ में मेला और जन्माष्टमी का उत्सव देखते ही बनता है. इस मंदिर को लोग करीब पांच हजार साल पुराना भी बताते हैं. लोकल 18 से मंदिर के पुजारी सोमनाथ कहते हैं कि सुबह और शाम कई लोग यहां परिक्रमा करते दिखाई देते हैं. किसी के हाथ में पूजा की थाली होती है तो कोई भगवान का नाम लेते हुए आगे बढ़ता रहता है. यहां शिव, शनि और दूसरे देवी-देवताओं के मंदिर भी बने हुए हैं. कई लोग पहले मुख्य मंदिर में दर्शन करते हैं और इसके बाद परिसर में बने दूसरे मंदिरों में जाते हैं.
फरीदाबाद के नवादा गांव में बांसुरी वाले राधा-कृष्ण का मंदिर लोगों के बीच खास पहचान रखता है. इस जगह का संबंध बहुत पुराने समय से माना जाता है. मंदिर परिसर में पहुंचते ही आसपास का माहौल बाकी जगहों से अलग महसूस होता है. पेड़-पौधों से घिरा इलाका और शांत वातावरण यहां आने वाले लोगों को कुछ देर रुकने पर मजबूर कर देता है. सुबह से ही श्रद्धालुओं का आना शुरू हो जाता है. दूर से आने वाले लोग भी यहां समय बिताते हैं.
लोकल 18 से मंदिर के पुजारी सोमनाथ बताते हैं कि यहां हर साल जेठ के महीने में बड़ा मेला लगता है. यह आयोजन करीब एक महीने तक चलता है. इस दौरान आसपास के गांवों के अलावा दूसरे इलाकों से भी लोग पहुंचते हैं. मंदिर में आने वाले श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा करते हैं. कोई दर्शन करता है तो कोई सेवा में जुट जाता है. मैं यहां पूजा-पाठ और मंदिर की देखरेख में अपनी जिम्मेदारी निभा रहा हूं.
स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर को लेकर कई पुरानी बातें सुनने को मिलती हैं. बताते हैं कि बंसी वाले कृष्ण का यह स्थान द्वापर युग से जुड़ा माना जाता है. कुछ ग्रामीण इसे करीब पांच हजार साल पुराना भी बताते हैं. हालांकि इन बातों का आधार स्थानीय मान्यताएं हैं. पीढ़ियों से चली आ रही कहानियों ने इस जगह को लोगों के लिए और खास बना दिया है. गांव के बुजुर्ग मंदिर से जुड़ी पुरानी घटनाओं और मान्यताओं को आज भी नई पीढ़ी के लोगों को बताते रहते हैं.
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यहां प्राचीन तालाब भी है. स्थानीय श्रद्धालु इस जलस्रोत को आस्था से जोड़कर देखते हैं. मंदिर के आसपास साधु संतों के लिए आश्रम भी बने हुए हैं. कई साधु यहां कुछ समय ठहरकर ध्यान और साधना करते हैं. सुबह के वक्त परिसर में शांत माहौल रहता है. पेड़ों की छांव और खुले स्थान के कारण यहां आने वाले लोगों को शहर की भागदौड़ से अलग वातावरण मिलता है. यही वजह है कि कई लोग दर्शन के साथ कुछ समय शांति से बैठना पसंद करते हैं.
परिसर में सिर्फ राधा-कृष्ण की प्रतिमा ही लोगों का ध्यान नहीं खींचती. यहां शिव, शनि और दूसरे देवी-देवताओं के मंदिर भी बने हुए हैं. श्रद्धालु अपनी आस्था के मुताबिक अलग-अलग स्थानों पर पूजा करते हैं. कई लोग पहले मुख्य मंदिर में दर्शन करते हैं और इसके बाद परिसर में बने दूसरे मंदिरों में जाते हैं. धार्मिक माहौल के साथ यहां खुली जगह भी काफी है. आसपास हरियाली दिखाई देती है. इसी वजह से दर्शन करने आने वाले परिवारों के लिए पूरा परिसर काफी शांत और सहज नजर आता है.
मंदिर में आने वाले भक्तों के बीच परिक्रमा करने की भी खास परंपरा है. लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार परिसर में बने रास्ते पर घूमते हैं. स्थानीय मान्यता है कि मन से की गई परिक्रमा से इच्छाएं पूरी हो सकती हैं. इसी विश्वास के चलते सुबह और शाम कई लोग यहां चक्कर लगाते दिखाई देते हैं. किसी के हाथ में पूजा की थाली होती है तो कोई भगवान का नाम लेते हुए आगे बढ़ता रहता है. इस दौरान पूरा वातावरण भक्ति से भरा हुआ नजर आता है.
जेठ के महीने में मंदिर का माहौल पूरी तरह बदल जाता है. एक महीने तक चलने वाले मेले में बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं. आसपास के लोग अपनी सुविधा के अनुसार यहां सेवा भी करते हैं. कोई भंडारे की व्यवस्था करता है तो कुछ लोग आने वालों को शरबत पिलाते हैं. मेले के दौरान मंदिर परिसर में चहल-पहल बढ़ जाती है. परिवारों के साथ लोग दर्शन के लिए आते हैं. दूर के इलाकों से आने वाले श्रद्धालुओं के कारण यह आयोजन गांव की बड़ी धार्मिक गतिविधियों में शामिल हो जाता है.
जन्माष्टमी के मौके पर नवादा गांव में बंसी वाले कृष्ण के मंदिर को लेकर उत्साह और बढ़ जाता है. पूरे इलाके में धार्मिक कार्यक्रमों की वजह से माहौल बदला हुआ दिखाई देता है. श्रद्धालु भगवान कृष्ण के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं. मंदिर में पूजा और भक्ति से जुड़े आयोजन होते हैं. ग्रामीणों के लिए यह स्थान केवल पूजा करने की जगह नहीं है. यह उनकी पुरानी परंपराओं से जुड़ा हुआ है. इसी कारण गांव के लोग मंदिर को अपनी संस्कृति और पुरानी विरासत का हिस्सा मानते हैं.











