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Who is Devraj Ambala : अंबाला के कुम्हार मोहल्ले का एक परिवार अपनी 100 साल पुरानी विरासत को संभाले हुए है. 75 साल के देवराज आज भी मिट्टी को अपने हाथों से आकार देते हैं. देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करीब 100 साल पुराना है. उनके पिता और दादा इसी काम से जुड़े हुए थे. लोकल 18 से देवराज बताते हैं कि पहले के समय में मिट्टी के बर्तनों की मांग काफी ज्यादा थी, लेकिन समय के साथ बाजार में कई तरह के आधुनिक बर्तन आ गए. इसके बावजूद उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा. मिट्टी के बर्तनों की अपनी अलग पहचान है. देवराज के बेटे सुरेंद्र बताते हैं कि उन्होंने कभी इस काम को छोटा नहीं समझा.
अंबाला. वक्त बदला, लोगों की पसंद बदली और घरों की रसोई में भी आधुनिक बर्तनों ने अपनी जगह बना ली, लेकिन अंबाला के कुम्हार मोहल्ले में एक परिवार ऐसा है जिसने अपनी 100 साल पुरानी विरासत को आज भी संभालकर रखा है. यहां मिट्टी सिर्फ बर्तन बनाने का सामान नहीं, बल्कि परिवार की पहचान और रोजी-रोटी का सहारा है. 75 साल के देवराज आज भी मिट्टी को अपने हाथों से आकार देते हैं और उनके साथ परिवार की अगली पीढ़ियां भी इस पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ा रही हैं. देवराज के परिवार में मिट्टी के बर्तन बनाने का काम करीब 100 साल पुराना है. उनके पिता और दादा इसी काम से जुड़े हुए थे. बचपन में देवराज अपने पिता को मिट्टी को अलग-अलग आकार देते देखते थे और धीरे-धीरे खुद भी इस हुनर को सीखने लगे. इसके बाद उन्होंने इस काम को अपना लिया. करीब 60 साल से वह खुद मिट्टी के सामान बना रहे हैं. उम्र भले ही 75 साल हो गई हो, लेकिन हाथों में मिट्टी आते ही उनके भीतर वही पुराना हुनर दिखाई देता है.
लोकल 18 से देवराज बताते हैं कि वह मिट्टी से घड़े, कढ़ाई, मंदिर, दीये, गड़बड़े और ठंडा कैंपर समेत कई तरह की चीजें तैयार करते हैं. पहले के समय में मिट्टी के बर्तनों की मांग काफी ज्यादा थी, लेकिन समय के साथ बाजार में कई तरह के आधुनिक बर्तन आ गए. इसके बावजूद उन्होंने अपना काम नहीं छोड़ा. उनका कहना है कि काम कोई छोटा या बड़ा नहीं होता, मेहनत से किया गया हर काम इंसान को आगे बढ़ा सकता है.
सिर्फ एक खुशी
उनके दोनों बेटे, बहुएं और पोते-पोतियां भी इस काम में हाथ बंटाते हैं. परिवार के करीब 10 लोग मिलकर मिट्टी के सामान को तैयार करने से लेकर उसकी सप्लाई तक का काम संभालते हैं. देवराज के लिए बड़ी खुशी यही है कि उनका पुश्तैनी हुनर उनके साथ खत्म नहीं हो रहा. वे कहते हैं कि आज भले ही लोग आधुनिक चीजों की तरफ तेजी से बढ़ रहे हों, लेकिन मिट्टी के बर्तनों की अपनी अलग पहचान है. उनका मानना है कि पुरानी संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी भी नई पीढ़ी की है. वह लोगों से मिट्टी के बर्तनों को दोबारा इस्तेमाल करने की अपील करते हैं. उनके लिए यह काम केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि उनके पिता और दादा से मिली वह विरासत है, जिसे उन्होंने पूरी जिंदगी अपने हाथों से संभाला है.
कहां-कहां सप्लाई
देवराज के बेटे सुरेंद्र बताते हैं कि उन्होंने कभी इस काम को छोटा नहीं समझा. पहले उनके दादा इस काम से जुड़े, फिर उनके पिता ने इसे संभाला और अब वह खुद अपने बेटे के साथ इसी काम को आगे बढ़ा रहे हैं. उनके मुताबिक, परिवार के सभी लोग एक साथ काम करते हैं तो इससे आपसी जुड़ाव भी बना रहता है और रोजगार भी चलता रहता है. उनका कहना है कि वह चाहते हैं कि आने वाले समय में भी उनके परिवार की यह परंपरा जारी रहे. सुरेंद्र बताते हैं कि उनके परिवार के बनाए मिट्टी के सामान की मांग सिर्फ अंबाला तक सीमित नहीं है. पंजाब में रोपड़ और राजपुरा समेत कई इलाकों में सामान भेजा जाता है. इसके अलावा हिमाचल प्रदेश और हरियाणा के अलग-अलग जिलों में भी उनका सामान पहुंचता है. पुराने समय में उनके पिता के बनाए गमले कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी तक सप्लाई होते थे. परिवार के सदस्य वहां जाकर भी कई बार मिट्टी का सामान तैयार करते थे.
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प्रियांशु को एक दशक से ज्यादा हो गए पत्रकारिता में. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी कर अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. यहां लंबे समय तक हरिया…
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