अंबाला: दशहरे का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रौनक बढ़ने लगी है. कहीं लोग पूजा की खरीदारी कर रहे हैं, तो कहीं सड़क किनारे सजे रावण के पुतले लोगों का ध्यान खींच रहे हैं. लेकिन अंबाला छावनी स्टेडियम के पास बिक रहे इन रावण के पुतलों के पीछे सिर्फ त्योहार की तैयारी नहीं, बल्कि 55 वर्षीय केसर देवी के संघर्ष, हुनर और अपने परिवार के लिए बेहतर भविष्य का सपना भी छिपा है.
बता दें कि रंग-बिरंगे कागज और अखबार से तैयार किए जा रहे इन पुतलों के जरिए केसर देवी अपने परिवार की आजीविका चलाने के साथ बच्चों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं. दरअसल, केसर देवी मूल रूप से राजस्थान की रहने वाली हैं और पिछले 30 से 40 वर्षों से अंबाला में रह रही हैं.
राजस्थान में रावण बनाने की परंपरा से मिली प्रेरणा
लोकल 18 को ज्यादा जानकारी देते हुए केसर देवी ने बताया कि राजस्थान में रावण के पुतले बनाकर बेचने की परंपरा देखकर उन्हें भी यह काम शुरू करने का विचार आया. पहले वह देसी दवाइयां बेचने का काम करती थीं, लेकिन अब परिवार के साथ मिलकर रावण के पुतले तैयार कर रही हैं. उनका पूरा परिवार इस काम में हाथ बंटाता है, ताकि त्योहार के सीजन में कुछ अतिरिक्त कमाई हो सके.
केसर देवी के लिए यह काम केवल कमाई का जरिया नहीं, बल्कि अपने हुनर को पहचान दिलाने का भी एक प्रयास है. वह सड़क किनारे बैठकर पुतले तैयार करती हैं और फिर उन्हें बेचने के लिए सजाती हैं. उनकी मेहनत से तैयार रंग-बिरंगे रावण राह चलते लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं.
तीन दिन में तैयार होता है रावण का एक पुतला
केसर देवी बताती हैं कि एक रावण का पुतला तैयार करने में करीब तीन दिन लग जाते हैं. उन्होंने कहा कि वह बांस की सहायता से ढांचा तैयार करती हैं और उस पर रंग-बिरंगे कागज व अखबार लगाकर पुतले को आकर्षक रूप देती हैं. तैयार किए गए पुतलों में छोटे पटाखे भी लगाए जाते हैं.
500 से 1000 रुपये तक है पुतलों की कीमत
उनके अनुसार, पुतलों की कीमत आकार के हिसाब से तय होती है. छोटे रावण करीब 500 रुपये में, जबकि बड़े पुतले लगभग 1000 रुपये तक में बेचे जा रहे हैं. उन्होंने बताया कि वह 2 से 3 फीट तक के रावण तैयार कर रही हैं, ताकि लोग इन्हें आसानी से खरीदकर अपनी गली-मोहल्ले में दशहरा मना सकें. हालांकि, कई बार ग्राहक कीमत कम करने की मांग करते हैं और उन्हें पुतले सस्ते में भी बेचने पड़ते हैं. ऐसे में तीन दिन की मेहनत का उचित दाम मिलना उनके लिए एक चुनौती बन जाता है.
बच्चों को बेहतर भविष्य देना चाहती हैं केसर देवी
केसर देवी ने बताया कि उनके परिवार में दो बेटे हैं. एक बेटे की शादी हो चुकी है और परिवार में पोते-पोतियां भी हैं. वह चाहती हैं कि मेहनत करके अपने बच्चों का पालन-पोषण अच्छे से कर सकें और उन्हें जिंदगी में आगे बढ़ने का मौका मिले. सीमित संसाधनों के बावजूद उनका हौसला कम नहीं हुआ है और वह आज भी मेहनत को ही अपने परिवार का सहारा मानती हैं.
उन्होंने कहा कि पिछले साल भी उन्होंने रावण के पुतले बनाकर बेचे थे और लोगों ने उनके काम को पसंद किया था. इसी उम्मीद के साथ इस बार भी उन्होंने पुतले तैयार किए हैं. उन्हें भरोसा है कि दशहरे तक उनके बनाए सभी रावण बिक जाएंगे.
केसर देवी की मेहनत को लोगों ने सराहा
वहीं, अंबाला के दयालबाग निवासी रमन कुमार ने बताया कि सड़क किनारे सजे रावण के पुतलों को देखकर वह रुक गए. उन्होंने कहा कि पुतलों की कारीगरी काफी अच्छी है. दशहरे पर भीड़ के कारण कई बच्चे मेले या आयोजन में नहीं पहुंच पाते. ऐसे में छोटे रावण खरीदकर गली-मोहल्लों में भी त्योहार मनाया जा सकता है.
रमन ने कहा कि वह खुद एक पुतला खरीदकर घर ले जाएंगे और दूसरे लोगों से भी अपील करते हैं कि वे केसर देवी की मेहनत का सम्मान करते हुए उनके बनाए रावण खरीदें.
दशहरे पर रावण के पुतले भले ही बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देंगे, लेकिन केसर देवी की कहानी यह भी बताती है कि हालात चाहे कितने ही कठिन क्यों न हों, मेहनत करने का जज्बा इंसान को आगे बढ़ने की उम्मीद देता है. उनके लिए हर पुतला सिर्फ एक बिक्री नहीं, बल्कि अपने परिवार के बेहतर कल की ओर बढ़ाया गया एक कदम है.




