Petrol-Diesel News: केंद्र सरकार ने अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में जारी अस्थिरता के बीच पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात शुल्क में बदलाव किया है। सरकार ने पेट्रोल पर निर्यात शुल्क बढ़ाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया है, जबकि डीजल पर निर्यात शुल्क घटाकर 8.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। संशोधित दरें 16 अक्टूबर 2026 से लागू हो गई हैं। इससे पहले 1 अक्टूबर को इन शुल्कों में संशोधन किया गया था।
सरकार के नए फैसले के तहत पेट्रोल के निर्यात पर लगने वाला विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) 0.50 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 2.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। वहीं, डीजल के निर्यात पर यह शुल्क 16 रुपये प्रति लीटर से घटाकर 8.5 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है। दोनों ईंधनों पर सड़क एवं अवसंरचना उपकर (RIC) शून्य बना हुआ है। विमानन टरबाइन ईंधन (ATF) के निर्यात शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस पर शुल्क पहले की तरह 10.5 रुपये प्रति लीटर रहेगा, जो पूरी तरह विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क के रूप में लागू होगा।
घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर क्या असर होगा?
सरकार ने स्पष्ट किया है कि घरेलू खपत के लिए बेचे जाने वाले पेट्रोल और डीजल पर मौजूदा उत्पाद शुल्क दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। नया संशोधन केवल निर्धारित पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर लागू होगा। इसलिए इस फैसले को घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों में सीधे बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
क्यों बदला गया निर्यात शुल्क?
पश्चिम एशिया में जारी संकट और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच केंद्र सरकार ने 27 मार्च 2026 को पेट्रोल, डीजल और विमानन ईंधन पर निर्यात शुल्क लागू किया था। इसका मुख्य उद्देश्य घरेलू बाजार में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करना और अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर कीमत मिलने पर निर्यातकों को घरेलू आपूर्ति दूसरी ओर मोड़ने से हतोत्साहित करना है।
सरकार हर पखवाड़े इन शुल्कों की समीक्षा करती है। इस दौरान पिछली समीक्षा के बाद कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के औसत अंतरराष्ट्रीय मूल्यों को ध्यान में रखा जाता है। ताजा बदलाव भी इसी आवधिक समीक्षा का हिस्सा है। कुल मिलाकर, सरकार ने पेट्रोल और डीजल के निर्यात शुल्क में अलग-अलग बदलाव किए हैं, जबकि ATF का शुल्क स्थिर रखा है। इस फैसले का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों के बीच देश में पेट्रोलियम उत्पादों की पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना है।









