Lauki ki kheti : पत्तियों पर काला धब्बा, सूख रहा पौधा…लौकी के पीछे पड़ा एन्थ्रेक्नोज, ये कैसा रोग?

On: September 8, 2026 7:22 PM
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पत्तियों पर धब्बा, सूख रहा पौधा…लौकी के पीछे पड़ा एन्थ्रेक्नोज, ये कैसा रोग?

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Bottle Gourd Farming : बारिश और उमस के मौसम में लौकी समेत कद्दूवर्गीय सब्जियों में फफूंदजनित रोग का खतरा बढ़ जाता है. एन्थ्रेक्नोज भी इन्हीं रोगों में शामिल है. सब्जी उत्पादक किसान बारिश के बाद फसल की पत्तियों, बेल और फलों को ध्यान से देखें. समय रहते लक्षणों की पहचान नहीं हुई तो रोग पूरे खेत में फैल सकता है. लोकल 18 से अंबाला के बागवानी विशेषज्ञ डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि एन्थ्रेक्नोज की शुरुआत लौकी की पत्तियों पर छोटे, हल्के पीले या पानी से भीगे हुए भूरे धब्बों से हो सकती है. संक्रमण बढ़ने पर इन धब्बों का रंग गहरा कत्थई या काला हो जाता है. बारिश के बाद खेतों में जरूरत से ज्यादा नमी और पत्तियों पर लंबे समय तक पानी की बूंदें बनी रहने से भी फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है.

बारिश के मौसम में कद्दूवर्गीय सब्जियों में फफूंदजनित रोग तेजी से फैलते हैं. एन्थ्रेक्नोज भी इन्हीं रोगों में शामिल सबसे घातक है. अंबाला में सब्जी उत्पादक किसान बारिश के बाद खेतों में फसल की पत्तियों, बेल और फलों को ध्यान से जरूर देखें. डॉ. सत्यनारायण के मुताबिक, समय रहते लक्षणों की पहचान नहीं हुई तो रोग का असर उत्पादन और फसल की गुणवत्ता पर पड़ सकता है.

डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि एन्थ्रेक्नोज की शुरुआत लौकी की पत्तियों पर छोटे, हल्के पीले या पानी से भीगे हुए भूरे धब्बों से हो सकती है. संक्रमण बढ़ने पर इन धब्बों का रंग गहरा कत्थई या काला हो जाता है. कई बार प्रभावित हिस्सा सूखकर छेद जैसा दिखाई देने लगता है और गंभीर स्थिति में पत्तियां झुलस सकती हैं. रोग बढ़ने पर बेल की टहनियों और कच्चे फलों पर भी काले धब्बे दिखाई दे सकते हैं. फल में सड़न शुरू होने से उसकी गुणवत्ता खराब हो सकती है और किसान को नुकसान उठाना पड़ता है.

मानसून में अंबाला और आसपास के क्षेत्रों में किसान लौकी की फसल को लेकर विशेष सतर्कता बरतें. बारिश के बाद खेत में पानी जमा रहने और वातावरण में लगातार नमी बने रहने से फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है. किसानों को पत्तियों के साथ-साथ बेल और फलों की भी नियमित जांच करनी चाहिए. यदि किसी पौधे पर असामान्य धब्बे दिखाई दें तो उसे नजरअंदाज न करें. शुरुआती स्तर पर रोग की पहचान होने से इसे खेत के दूसरे पौधों तक फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है.

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एन्थ्रेक्नोज का असर केवल पत्तियों तक सीमित नहीं रहता. संक्रमण बढ़ने पर लौकी की बेल की टहनियों और फलों पर भी गहरे रंग के धब्बे दिखाई दे सकते हैं. फल प्रभावित होने पर उसकी सतह पर सड़न शुरू हो सकती है, जिससे बाजार में उसकी मांग घट जाती है. अंबाला जैसे क्षेत्र में जहां किसान स्थानीय मंडियों के साथ आसपास के बाजारों में सब्जियों की सप्लाई करते हैं, वहां गुणवत्तापूर्ण उत्पादन बनाए रखना बेहद जरूरी है. इसलिए किसान शुरुआती लक्षणों पर ही फसल की जांच कराएं.

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. सत्यनारायण के अनुसार, बारिश के बाद खेतों में जरूरत से ज्यादा नमी और पत्तियों पर लंबे समय तक पानी की बूंदें बनी रहने से फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ सकता है. किसानों को खेत में जलभराव नहीं होने देना चाहिए और बारिश के बाद फसल की नियमित निगरानी करनी चाहिए. अंबाला के किसान खासतौर पर निचले हिस्सों वाले खेतों में पानी की निकासी का ध्यान रखें. रोग के लक्षण दिखाई देने पर अपने क्षेत्र के बागवानी विभाग या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही उपचार करें.

यदि लौकी की फसल में एन्थ्रेक्नोज के लक्षण दिखाई देते हैं तो अत्यधिक प्रभावित पत्तियों और सड़े हुए फलों को तोड़कर खेत से बाहर नष्ट करने की सलाह दी जाती है. इन्हें खेत में ही छोड़ने से संक्रमण के फैलने का खतरा बना रह सकता है. बेलों के आसपास अनावश्यक नमी जमा न होने दें. नियमित अंतराल पर फसल का निरीक्षण करें और किसी भी तरह के नए धब्बे या सड़न दिखाई देने पर विशेषज्ञ से संपर्क करें.

एन्थ्रेक्नोज के नियंत्रण के लिए थियोफिनेट मिथाइल 70% डब्ल्यूपी का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर साफ मौसम में छिड़काव करें. हालांकि, किसानों को किसी भी फफूंदनाशी का इस्तेमाल अपने क्षेत्र में लागू कृषि विभाग की सिफारिश और उत्पाद के लेबल निर्देशों के अनुसार ही करना चाहिए. बारिश की संभावना होने पर छिड़काव का समय भी विशेषज्ञ की सलाह से तय करें. एन्थ्रेक्नोज के लिए थियोफिनेट मिथाइल आधारित उत्पादों का उपयोग कई कृषि स्रोतों में दर्ज है.

बागवानी विशेषज्ञ डॉ. सत्यनारायण बताते हैं कि मानसून के दौरान लौकी की फसल को लगातार देखते रहें. पत्तियों पर भूरे या काले धब्बे, टहनियों पर संक्रमण या फलों में सड़न दिखाई दे तो तुरंत कृषि या बागवानी विशेषज्ञ से संपर्क करें. हरियाणा के बागवानी विभाग की किसान हेल्पलाइन 1800-180-2021 भी उपलब्ध है. समय पर पहचान और उचित फसल प्रबंधन से रोग के फैलाव को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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