अंबाला. अगर शिक्षक सिर्फ नौकरी करने के बजाय स्कूल को अपना घर समझकर जिम्मेदारी निभाने लगे तो सरकारी स्कूल की तस्वीर भी किसी निजी स्कूल की तरह बदल सकती है. अंबाला के खुड्डा कलां स्थित सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल सुभाष शर्मा ने इसी सोच को अपनी मेहनत का आधार बनाया और स्कूल का ऐसा कायाकल्प किया कि आज यहां पढ़ने वाले बच्चे खुद को किसी निजी स्कूल के छात्रों से कम महसूस नहीं करते. उनकी इसी मेहनत और शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों को देखते हुए अब शिक्षक दिवस पर उन्हें राज्य स्तरीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा. यह सम्मान उन्हें राज्यपाल के हाथों दिया जाएगा. अंबाला जिले से राज्य स्तरीय पुरस्कार पाने वाले वह पहले प्रिंसिपल बताए जा रहे हैं. पुरस्कार की घोषणा के बाद प्रिंसिपल सुभाष शर्मा ही नहीं, बल्कि पूरे स्कूल में खुशी की लहर है. स्टाफ और विद्यार्थियों के लिए यह सम्मान इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने अपनी आंखों के सामने स्कूल को बदलते हुए देखा है.
मन में आया सवाल
प्रिंसिपल सुभाष शर्मा ने लोकल 18 को बताया कि जब उन्होंने करीब आठ महीने पहले खुड्डा कलां के सरकारी स्कूल में जिम्मेदारी संभाली तो स्कूल की स्थिति काफी खराब थी. गर्ल्स टॉयलेट से लेकर मिड-डे मील और साइंस लैब तक कई जगह व्यवस्थाएं जर्जर थीं, स्कूल की बिल्डिंग के कई हिस्से भी टूटे हुए थे. यह स्थिति देखकर उनके मन में सवाल आया कि आखिर बच्चों को बेहतर माहौल क्यों न दिया जाए. इसके बाद उन्होंने सरकारी मदद का इंतजार करने के बजाय सामाजिक संस्थाओं और समाजसेवियों से संपर्क करना शुरू किया. धीरे-धीरे लोगों का सहयोग मिला. स्कूल में मरम्मत और सुधार के काम शुरू हुए. आज वही स्कूल साफ-सुथरा नजर आता है. टॉयलेट को बेहतर बनाया गया, मिड-डे मील की व्यवस्था सुधारी गई और साइंस लैब को भी बच्चों के प्रयोग और प्रैक्टिकल के लिए बेहतर बनाया गया. स्कूल की सुरक्षा को लेकर भी कदम उठाए गए. परिसर में सीसीटीवी कैमरे लगवाए गए, ताकि किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर नजर रखी जा सके. प्रिंसिपल ने स्कूल की पहले और अब की तस्वीरें भी साझा की हैं, जिनमें बदलाव साफ दिखाई देता है.
छात्र को दिलाया 1.11 लाख का पुरस्कार
सुभाष शर्मा की कोशिशें सिर्फ स्कूल की इमारत तक सीमित नहीं रहीं. उन्होंने बच्चों की पढ़ाई और आर्थिक मदद के लिए भी प्रयास किए. स्कूल के एक बच्चे ने 98.2 प्रतिशत अंक हासिल किए तो उन्होंने सरकार से संपर्क कर उसे 1.11 लाख रुपये का पुरस्कार दिलवाने में मदद की. आर्थिक रूप से कमजोर पांच छात्राओं की पढ़ाई जारी रखने के लिए बैंक से बातचीत और सिफारिश कर उन्हें हर महीने 5 हजार रुपये की छात्रवृत्ति दिलवाने में भी भूमिका निभाई. छात्राओं का कहना है कि इस आर्थिक मदद से उनकी पढ़ाई का खर्च संभालना काफी आसान हुआ है.
27 साल का सफर
सुभाष शर्मा बताते हैं कि शिक्षा के क्षेत्र में उनकी सेवा का सफर करीब 27 साल का है. नौकरी की शुरुआत में जब वह एक गांव के स्कूल में पहुंचे तो वहां की हालत बेहद खराब थी. स्कूल परिसर में लोग अपने पशु तक बांधते थे. उन्होंने पंचायत की मदद से वहां चारदीवारी करवाने का काम शुरू किया और धीरे-धीरे स्कूल का माहौल बदला. यही अनुभव उनके लिए प्रेरणा बन गया. इसके बाद जहां भी उनकी पोस्टिंग हुई, उन्होंने स्कूल को बेहतर बनाने की कोशिश की. कई बार स्कूल की छुट्टी के बाद भी वह शाम के समय बच्चों को निशुल्क कक्षाएं देते रहे, ताकि कमजोर विद्यार्थी भी बेहतर प्रदर्शन कर सकें.
बढ़ गई बच्चों की संख्या
प्रिंसिपल के अनुसार, स्कूल में बदलाव का असर विद्यार्थियों की संख्या पर भी पड़ा है, उनके आने के बाद 50 से 60 बच्चों की संख्या बढ़ी और अब स्कूल में 300 से अधिक विद्यार्थी पढ़ रहे हैं. उनका अगला लक्ष्य बच्चों को बदलते तकनीकी दौर से जोड़ना है. उनका कहना है कि अब AI का जमाना है, इसलिए सरकारी स्कूल के बच्चों को भी नई तकनीक से पीछे नहीं रहना चाहिए. स्कूल में अगले सत्र से रोबोटिक्स और नई तकनीक से जुड़ी शिक्षा शुरू करने के लिए सरकार को पत्र लिखा गया है. राज्य स्तरीय पुरस्कार मिलने की बात पर सुभाष शर्मा भावुक हो जाते हैं. सुभाष ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2024 में इस पुरस्कार के लिए आवेदन किया था और अपनी योजनाओं व किए गए कार्यों की जानकारी दी थी, इसके बाद कमेटी ने स्कूल और उनके कार्यों का मूल्यांकन किया.
क्या बोली छात्राएं
स्कूल की छात्रा कल्पना बताती हैं कि प्रिंसिपल सर के आने के बाद स्कूल में बहुत बदलाव हुआ है, पहले गर्ल्स टॉयलेट और मिड-डे मील की स्थिति खराब थी, लेकिन अब व्यवस्थाएं काफी बेहतर हैं. छात्रा एकता ने बताया कि आर्थिक परेशानी के कारण पढ़ाई में दिक्कत आती थी, लेकिन प्रिंसिपल ने बैंक से बात कर हर महीने 5 हजार रुपये की छात्रवृत्ति दिलाने में मदद की. एक छात्र ने बताया कि प्रिंसिपल खुद स्टाफ और बच्चों के साथ मिलकर पौधे लगाते हैं और स्कूल को सुंदर बनाने में जुटे रहते हैं.













