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Parson Temple Faridabad : फरीदाबाद की अरावली पहाड़ियों में स्थित परसोंन मंदिर आस्था, इतिहास और पौराणिक मान्यताओं का अनोखा संगम है. स्थानीय मान्यता के हिसाब से यह महर्षि पराशर की तपोभूमि और महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली है. यहां हनुमान जी के पदचिह्न और तीन पवित्र कुंडों के भी होने की मान्यता है. फरीदाबाद डीएवी कॉलेज की इतिहास विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर कमलेश से जानिए इस प्राचीन धरोहर का रोचक इतिहास. प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि समय के साथ इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व और भी बढ़ा है. यहां पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है. महर्षि पराशर ने यहां तीन कुंड बनाए थे. लोगों का विश्वास है कि इन कुंडों में स्नान करने से पुराने से पुराने रोग भी दूर हो जाते हैं.
फरीदाबाद. अरावली क्षेत्र में का परसोंन मंदिर फरीदाबाद का सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि इतिहास, आस्था और पौराणिक मान्यताओं का अनोखा संगम माना जाता है. इस मंदिर का संबंध त्रेता युग से जोड़ा जाता है. स्थानीय मान्यताओं में यह स्थान महर्षि पराशर की तपोभूमि और महर्षि वेदव्यास की जन्मस्थली के रूप में प्रसिद्ध है. यही वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां दर्शन करने और पहाड़ी पर स्थित प्राचीन स्थलों को देखने पहुंचते हैं. लोकल 18 से फरीदाबाद डीएवी कॉलेज की इतिहास विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि परसोंन मंदिर अरावली की तलहटी में स्थित एक बेहद महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल है. स्थानीय परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस क्षेत्र का संबंध महर्षि पराशर और महर्षि वेदव्यास से है. मान्यता है कि महर्षि पराशर ने यहां कठोर तपस्या की थी और महर्षि वेदव्यास का जन्म भी इसी स्थान पर हुआ था. इसलिए यह स्थान प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों की तपोभूमि माना जाता रहा है.
प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि समय के साथ इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व और भी बढ़ा है. यहां साधना और पूजा करने से मानसिक शांति मिलती है. इसी क्षेत्र में एक प्राचीन शिवलिंग मिलने की बात भी कही जाती है, जिसके कारण इसे भगवान शिव की आराधना का महत्वपूर्ण स्थल भी माना जाता है. यही कारण है कि यहां पूरे साल श्रद्धालुओं का आना-जाना लगा रहता है. प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि परसोंन मंदिर का सांस्कृतिक महत्व भी कम नहीं है. यह क्षेत्र गुरु-शिष्य परंपरा, तप-साधना और लोक परंपराओं से जुड़ा रहा है. यहां समय-समय पर धार्मिक आयोजन और लोक कथाओं का वाचन होता है. आसपास के गांवों के साथ-साथ दूर-दराज से भी लोग यहां दर्शन और पूजा के लिए पहुंचते हैं.
कब आए थे हनुमान
अरावली पर्वतमाला के बारे में प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि यह दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है. प्राचीन समय से ही यह इलाका प्राकृतिक संसाधनों के कारण मानव बसावट का केंद्र रहा है. अगर इस क्षेत्र का विस्तार से पुरातात्विक सर्वेक्षण किया जाए तो यहां से कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष और प्रमाण मिलने की संभावना है, जो स्थानीय परंपराओं और पौराणिक मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि करने में मदद कर सकते हैं. प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि स्थानीय मान्यताओं के अनुसार जब त्रेता युग में लक्ष्मण मूर्छित हुए थे और हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने जा रहे थे, तब उन्होंने रास्ते में इस पहाड़ी पर कुछ समय विश्राम किया था. उसी समय से उनके पैरों के निशान यहां बने जिन्हें आज भी हनुमान जी के पदचिह्न के रूप में पूजा जाता है.
कैसे बने तीन कुंड
प्रोफेसर कमलेश बताती हैं कि एक और मान्यता के अनुसार महर्षि पराशर ने तीर से यहां तीन कुंड उत्पन्न किए थे. लोगों का विश्वास है कि इन कुंडों में स्नान करने से पुराने से पुराने रोग भी दूर हो जाते हैं. इसी आस्था के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. प्रोफेसर कमलेश के मुताबिक, परसोंन मंदिर केवल आस्था का केंद्र नहीं बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक सुंदरता और संभावित पुरातात्विक धरोहर का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. ऐसे ऐतिहासिक स्थलों का संरक्षण करना हम सभी की जिम्मेदारी है ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनके इतिहास और महत्व को जान सकें.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें









