‘बेचने पर ज्यादा नुकसान था’, फरीदाबाद के लाल सिंह ने खेत में ही छोड़ दी मिर्च, क्यों हुआ ऐसा?

On: July 29, 2026 9:12 AM
Follow Us:

होमताजा खबरकृषि

‘बेचने पर ज्यादा नुकसान था’, फरीदाबाद के लाल सिंह ने खेत में ही छोड़ दी मिर्च

Last Updated:

Chilli Farming : फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव में मिर्च किसानों की उम्मीदें टूट गई हैं. जिस मिर्च का हर साल 50 रुपये किलो तक भाव मिलता था, वह इस बार 10 रुपये किलो भी नहीं बिक रही. किसान लाल सिंह ने दो एकड़ की फसल की तुड़ाई तक नहीं कराई क्योंकि मंडी ले जाने से ज्यादा खर्च आ रहा था. करीब 1 लाख रुपये का नुकसान हो चुका है. लोकल 18 से बातचीत में किसान लाल सिंह बताते हैं कि मंडी में मिर्च के रेट इतने कम हो गए कि तुड़ाई का खर्च भी नहीं निकल रहा. इतनी मेहनत और खर्च के बाद जब फसल तैयार होती है तो किसान को उम्मीद रहती है कि अच्छा दाम मिलेगा, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ.

फरीदाबाद. किसान पूरे साल खेत में पसीना बहाता है, क्योंकि उसे उम्मीद होती है कि जब फसल तैयार होगी तो घर में खुशियां आएंगी. बच्चों की फीस भरेगा, घर का खर्च चलेगा और मेहनत का फल मिलेगा. लेकिन जब वही फसल मंडी में औने-पौने दाम पर बिके या बिक ही न पाए तो क्या कहा जाए. इस बार फरीदाबाद के सुनपेड़ गांव के किसान भी कुछ ऐसी ही परेशानी से गुजर रहे हैं. जिन मिर्च से हर साल अच्छी कमाई होती थी, इस बार वही मिर्च खेतों में लाल होकर पड़ी है. किसानों का कहना है कि मेहनत भी गई, पैसा भी गया और उम्मीद भी टूट गई.

लोकल 18 से बातचीत में किसान लाल सिंह बताते हैं कि मैंने दो एकड़ में मिर्च की खेती की थी. इस बार लाखों रुपये की उम्मीद थी, लेकिन मंडी में मिर्च के रेट इतने कम हो गए कि तुड़ाई का खर्च भी नहीं निकल रहा. अभी मिर्च 10 रुपये किलो या उससे भी कम बिक रही है. हर साल यही मिर्च 50 रुपये किलो तक चली जाती थी, लेकिन इस बार कोई 10 रुपये किलो में भी खरीदने को तैयार नहीं है. दो एकड़ की खेती में करीब 1 लाख रुपये का नुकसान हो गया.

लाल सिंह बताते हैं कि मिर्च की खेती करना आसान नहीं होता. इसमें दवाई, खाद और मजदूरी पर काफी पैसा खर्च करना पड़ता है. एक एकड़ में करीब 10 से 12 पैकेट बीज लगते हैं. खेत की 7 से 8 बार जुताई करनी पड़ती है. इतनी मेहनत और खर्च के बाद जब फसल तैयार होती है तो किसान को उम्मीद रहती है कि अच्छा दाम मिलेगा, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ. लाल सिंह के मुताबिक, मिर्च का सीजन अभी अक्टूबर तक चलता है, लेकिन मंडी के हालात देखकर अब मन ही टूट गया है. जब रेट ही नहीं मिल रहे तो फसल तोड़कर मंडी ले जाने का भी कोई फायदा नहीं है. मजदूरों का खर्च अलग और गाड़ी का किराया अलग देना पड़ता है. ऐसे में नुकसान और बढ़ जाता है.

कमाई का कोई दूसरा जरिया नहीं

लाल सिंह बताते हैं कि मैंने दो एकड़ की मिर्च की तुड़ाई ही नहीं कराई. पूरी फसल खेत में ही छोड़ दी. अगर मंडी ले जाता तो जितना मिलता, उससे ज्यादा खर्च रास्ते में हो जाता. अब खेत में मिर्च लाल होकर पड़ी है. जिसे देखकर दिल दुखता है क्योंकि इसमें मेरी महीनों की मेहनत और लाखों रुपये लगे हुए हैं. मेरा पूरा परिवार खेती पर ही निर्भर है. बच्चों की पढ़ाई-लिखाई से लेकर घर का सारा खर्च इसी खेती से चलता है. हमारे परिवार में चाचा, ताऊ और उनके लड़के भी खेती ही करते हैं. हमारे पास कमाई का कोई दूसरा जरिया नहीं है. जब खेती में ही नुकसान हो जाए तो पूरे परिवार की चिंता बढ़ जाती है.

यही उम्मीद थी

लाल सिंह बताते हैं कि हर साल बरसात के समय मिर्च के अच्छे दाम मिलते थे, इसलिए इस बार भी यही उम्मीद थी. लेकिन इस बार मंडी में रेट गिर गए. अब यही सोच रहे हैं कि इतनी मेहनत के बाद भी अगर फसल का सही दाम नहीं मिलेगा तो आगे खेती कैसे करेंगे. किसान की सबसे बड़ी उम्मीद उसकी फसल होती है, लेकिन जब वही उम्मीद टूट जाए तो उसका दर्द सिर्फ वही समझ सकता है जिसने खेत में दिन-रात मेहनत की हो.

About the Author

authorimg

Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…

और पढ़ें

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Follow Now