फरीदाबाद: संपत्ति को लेकर अक्सर लोगों के मन में सवाल रहता है कि नॉमिनी और कानूनी वारिस में क्या अंतर होता है. क्या नॉमिनी को पूरी संपत्ति मिल जाती है. अगर किसी डीमैट खाते में नॉमिनी नहीं है तो उसके पैसे पर किसका अधिकार होगा. पति, पत्नी और बच्चों के बीच संपत्ति का बंटवारा किस तरह होता है और वसीयत तथा नॉमिनेशन में विवाद होने पर किसे प्राथमिकता मिलती है. ऐसे ही सवालों को लेकर Local18 ने फरीदाबाद सेक्टर-12 कोर्ट में एडवोकेट दीपु सिंह रावत से बातचीत की. दीपु सिंह रावत डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन फरीदाबाद के पूर्व वाइस प्रेसिडेंट रह चुके हैं और वर्ष 2010 से नियमित रूप से प्रैक्टिस कर रहे हैं. उन्होंने संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े इन सवालों को आम भाषा में समझाया.
नॉमिनी और कानूनी वारिस में क्या होता है अंतर?
एडवोकेट दीपु सिंह रावत ने बताते हैं कि नॉमिनी वह व्यक्ति होता है, जिसे कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति या किसी खाते के संबंध में नामित करता है. कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से किसी को भी नॉमिनी बना सकता है. वह पड़ोसी हो सकता है, कोई रिश्तेदार हो सकता है या कोई अन्य व्यक्ति भी हो सकता है, जिसके प्रति व्यक्ति का लगाव हो. वहीं कानूनी वारिस का निर्धारण संबंधित कानून के अनुसार होता है. उदाहरण के तौर पर हिंदू परिवारों में उत्तराधिकार से जुड़े मामले हिंदू सक्सेशन एक्ट के तहत तय होते हैं. इसी तरह अलग-अलग धर्मों के लोगों के लिए उनके संबंधित पर्सनल लॉ के अनुसार कानूनी वारिस तय होते हैं.
संपत्ति की प्रकृति से तय होते हैं अधिकार
दीपू सिंह रावत बताते हैं कि यह इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति का मालिक किस तरह का दस्तावेज बनाकर अपनी संपत्ति का अधिकार तय करता है. व्यक्ति अपनी संपत्ति के संबंध में किसी के पक्ष में व्यवस्था कर सकता है. हालांकि पैतृक या पूर्वजों से चली आ रही संपत्ति के मामले में स्थिति अलग होती है. ऐसी संपत्ति को आम बोलचाल में दादा-लाई या पैतृक संपत्ति कहा जाता है. इसमें परिवार के अन्य सदस्यों के अधिकार भी जुड़े हो सकते हैं. इसलिए ऐसी संपत्ति को लेकर अलग कानूनी नियम लागू होते हैं.
बिना वसीयत मौत होने पर कैसे तय होता है संपत्ति का अधिकार?
दीपू सिंह रावत बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु बिना वसीयत किए हो जाती है, तो ऐसी स्थिति को कानून में इंटेस्टेट कहा जाता है. ऐसी स्थिति में संपत्ति और अधिकारों का निर्धारण संबंधित उत्तराधिकार कानून के अनुसार होता है. हिंदू सक्सेशन एक्ट में उत्तराधिकार से जुड़े अलग-अलग प्रावधान दिए गए हैं. इसमें एग्नेट, कॉग्नेट, हाफ-ब्लड और फुल-ब्लड जैसे कानूनी शब्दों का भी उल्लेख है. इसलिए किसी खाते में नॉमिनी नहीं होने पर संबंधित कानूनी प्रक्रिया और उत्तराधिकार कानून के अनुसार अधिकार तय होते हैं.
पत्नी और दो बच्चों के बीच कैसे बंटेगी संपत्ति?
दीपू सिंह रावत उदाहरण देते हुए बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति के परिवार में उसकी पत्नी और दो बच्चे हैं और वह व्यक्ति बिना वसीयत के मर जाता है, तो सामान्य उदाहरण के तौर पर संपत्ति तीन हिस्सों में बंटेगी. यानी पत्नी और दोनों बच्चों को एक-एक तिहाई हिस्सा मिलेगा. यह उदाहरण आम लोगों को समझाने के लिए है और वास्तविक मामले में संपत्ति तथा उत्तराधिकार की स्थिति संबंधित कानून और परिस्थितियों के आधार पर देखी जाती है.
पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों का अधिकार कब बनता है?
दीपू सिंह रावत बताते हैं कि अगर पति की संपत्ति की बात करें, तो यह देखना जरूरी है कि वह संपत्ति किस प्रकार की है और उसे पति ने किस तरह प्राप्त किया है. उदाहरण के तौर पर अगर संपत्ति दादा की है और वह उनके बेटे यानी अगली पीढ़ी को मिलती है, तो उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार हिस्सेदारी तय होगी. इसके बाद संबंधित व्यक्ति की मृत्यु होने पर उसके बच्चों और पत्नी के अधिकार भी उत्तराधिकार कानून के अनुसार निर्धारित होते हैं. इसलिए पति की संपत्ति में पत्नी और बच्चों का अधिकार हर मामले में एक जैसा नहीं माना जा सकता. संपत्ति की प्रकृति और लागू कानून के आधार पर अधिकार तय होते हैं.
वसीयत और नॉमिनेशन में क्या है अंतर?
वसीयत और नॉमिनेशन के संबंध में दीपू सिंह रावत बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति ने अपनी संपत्ति के संबंध में वैध वसीयत की है, तो वसीयत के प्रावधानों का महत्व होता है. वसीयत को नॉमिनेशन से अलग समझना चाहिए. किसी व्यक्ति ने वसीयत या अन्य वैध दस्तावेज के माध्यम से अपनी संपत्ति के संबंध में जो व्यवस्था की है, उसके आधार पर अधिकारों का निर्धारण किया जा सकता है. ऐसे मामलों में दस्तावेज की वैधता और संबंधित उत्तराधिकार कानून को भी देखा जाता है.











