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Faridabad News : जब ज्यादातर लोग 60 की उम्र में आराम की सोचते हैं, तब बल्लभगढ़ के ऊंचा गांव के किसान कुंवर दास को सांस लेने की फुर्सत नहीं है. खेती से जितनी कमाई होती है, उससे बस किसी तरह घर का खर्च चल जाता है. कुंवर दास लोकल 18 से बताते हैं कि मेरी उम्र 61 साल हो गई है, लेकिन आज तक बुढ़ापा पेंशन नहीं मिला है. वे बताते हैं कि मेरे पास सारे जरूरी डॉक्यूमेंट हैं. कोई दूसरा रोजगार नहीं है, सिर्फ खेती ही सहारा है.
फरीदाबाद. उम्र 61 साल हो चुकी है, लेकिन जिम्मेदारियां अभी भी कम नहीं हुई हैं. जब ज्यादातर लोग इस उम्र में आराम की सोचते हैं, तब बल्लभगढ़ के ऊंचा गांव के किसान कुंवर दास आज भी हर सुबह साइकिल उठाकर कई किलोमीटर दूर अपने खेत की तरफ निकल पड़ते हैं. धूप हो, बारिश हो या फिर तेज गर्मी दिन भर खेत में मेहनत करना उनकी मजबूरी है. खेती से जितनी कमाई होती है, उससे बस किसी तरह घर का खर्च चल जाता है. ऐसे में उन्हें उम्मीद थी कि बुढ़ापे में सरकार की पेंशन सहारा बनेगी, लेकिन पेंशन नहीं बनने की वजह से उनकी परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है.
कुंवर दास लोकल 18 से बताते हैं कि मैं बल्लभगढ़ के ऊंचा गांव का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 61 साल हो गई है, लेकिन आज तक मेरी बुढ़ापा पेंशन नहीं बन पाई. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि फैमिली आईडी में मेरी इनकम ज्यादा दिखाई गई है. कितनी इनकम दिखाई गई है, मुझे खुद भी नहीं पता. मेरे पास सारे जरूरी डॉक्यूमेंट हैं, फिर भी पेंशन नहीं बन रही है. हमारा कोई दूसरा रोजगार नहीं है, सिर्फ खेती ही सहारा है.
किसी तरह चल रहा घर
कुंवर दास बताते हैं कि मैं हर रोज ऊंचा गांव से सुनपेड़ गांव में अपने खेत तक साइकिल से जाता हूं. सुबह निकलता हूं और पूरा दिन खेत में मेहनत करता हूं. धूप हो, बारिश हो या ठंड खेत पर जाना ही पड़ता है. खेती में भी अब पहले जैसी कमाई नहीं रही. कभी ओले पड़ जाते हैं तो फसल खराब हो जाती है, कभी मौसम साथ नहीं देता. जो थोड़ा बहुत मिलता है, उसी से घर का खर्च चलता है. ऐसे में अगर पेंशन मिल जाए तो बुढ़ापे में थोड़ा सहारा मिल जाएगा.
रोज की चिंता से राहत
कुंवर दास बताते हैं कि गांव में कुछ लोग ऐसे भी हैं जो पेंशन बनवाने के नाम पर पैसे मांगते हैं. मुझसे कहा गया कि शुरुआत की तीन पेंशन देनी पड़ेगी, तभी पेंशन बनवाएंगे. यह बात सुनकर मुझे बहुत दुख हुआ. मैंने किसी को पैसे नहीं दिए. अभी तक मैं पेंशन ऑफिस भी नहीं गया हूं, लेकिन अब वहां जाकर अपनी पूरी बात रखूंगा. मेरी सिर्फ यही मांग है कि अगर मेरे सारे कागज पूरे हैं तो मेरी पेंशन बना दी जाए ताकि बुढ़ापे में थोड़ा सहारा मिल सके और रोज की इस चिंता से राहत मिल जाए.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें









