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Kailash Mandir Ambala : सावन आते ही अंबाला छावनी के कैलाश मंदिर हाथीखाना का नजारा देखते ही बनता है. इस मंदिर के साथ ‘हाथीखाना’ शब्द का जुड़ना सिर्फ संयोग नहीं. ये मंदिर अंबाला छावनी के उन प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है, जिनसे लोगों की आस्था पीढ़ियों से जुड़ी हुई हैं. महंत मनमोहन दास महाराज लोकल 18 से बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना साल 1844 में हुई थी. इससे पहले इस स्थान पर साधु-संतों का डेरा रहा करता था. वो दौर अंग्रेजी हुकूमत का था. अंग्रेजों के शासनकाल में यहां सेना के हाथी बांधे जाते थे. इसी वजह से मंदिर के नाम के साथ ‘हाथीखाना’ जुड़ गया. इस मंदिर के संस्थापक श्री श्री 1008 महंत श्री जयराम दास जी महाराज लायलपुर वाले बताए जाते हैं.
अंबाला. सावन का महीना आते ही भोलेनाथ की भक्ति में माहौल शिवमय हो जाता है. शिवरात्रि के दिन इस भक्ति का रंग और भी गहरा नजर आता है. अंबाला छावनी के प्राचीन कैलाश मंदिर हाथीखाना में आज (मंगलवार) को कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला. सुबह होते ही मंदिर के बाहर श्रद्धालुओं की कतारें लगनी शुरू हो गईं और देखते ही देखते पूरा मंदिर परिसर हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयकारों से गूंज उठा. कोई दूध लेकर पहुंचा तो कोई हरिद्वार से कांवड़ में गंगाजल लेकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने आया. श्री कैलाश मंदिर हाथीखाना अंबाला छावनी के उन प्राचीन धार्मिक स्थलों में शामिल है, जिनसे लोगों की आस्था पीढ़ियों से जुड़ी हुई हैं.
गद्दीनशीन शिष्य के हाथों में कमान
मंदिर के महंत मनमोहन दास महाराज लोकल 18 से बताते हैं कि इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1844 में हुई थी. इससे पहले भी इस स्थान पर साधु-संतों का डेरा रहा करता था. बताया जाता है कि अंग्रेजों के शासनकाल में यहां सेना के हाथी बांधे जाते थे. इसी वजह से मंदिर के नाम के साथ ‘हाथीखाना’ जुड़ गया. समय के साथ यह स्थान साधु-संतों की तपस्थली और फिर भगवान शिव के प्रमुख मंदिर के रूप में विकसित होता चला गया. इस मंदिर के संस्थापक श्री श्री 1008 महंत श्री जयराम दास जी महाराज लायलपुर वाले बताए जाते हैं. वर्तमान में उनके गद्दीनशीन शिष्य मनमोहन दास महाराज मंदिर की देखरेख कर रहे हैं.
आज भी द्वार पर हाथी
महंत मनमोहन दास महाराज बताते हैं कि पूरे सावन मंदिर में श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है, लेकिन सावन शिवरात्रि और महाशिवरात्रि पर भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती है. दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और श्रद्धा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं. मंदिर की खास पहचान यहां स्थापित करीब 40 फीट ऊंची भगवान अर्धनारीश्वर की प्रतिमा है. मंदिर में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं का ध्यान इस विशाल प्रतिमा की ओर चला जाता है. परिसर में नंदी महाराज सहित दूसरे देवी-देवताओं की प्रतिमाएं भी हैं. मंदिर के मुख्य द्वार के बीच भगवान शिव की प्रतिमा और दोनों तरफ बनी हाथियों की प्रतिमाएं मंदिर के इतिहास और उसकी पहचान को दर्शाती हैं.
40 साल से आ रही हूं यहां
श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं, बल्कि उनकी आस्था और विश्वास का केंद्र है. श्रद्धालु करन लोकल 18 से कहते हैं वह कई वर्षों से सावन में यहां माथा टेकने आती हैं. उनके परिवार की ओर से हरिद्वार से गंगाजल लाया गया, जिसे उन्होंने भगवान शिव को अर्पित किया. सुनीता रानी ने बताया कि वह करीब 40 वर्षों से इस मंदिर में आ रही हैं. हर सावन में वह भोलेनाथ के दरबार में परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…
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