अंबाला: कभी बच्चे परीक्षा के नाम से घबराते हैं तो कभी छोटी-सी गलती होने पर उन्हें लगता है कि अब सभी उनसे नाराज हो जाएंगे. वहीं, घर और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच महिलाएं भी कई बार अपनी परेशानियों को मन के अंदर दबाकर रख लेती हैं. धीरे-धीरे यही चिंता तनाव और एंग्जायटी का रूप लेने लगती है. बदलती जीवनशैली में अब एंग्जायटी केवल बड़ों तक सीमित नहीं रही, बल्कि बच्चों और महिलाओं में भी इसके अलग-अलग लक्षण देखने को मिल रहे हैं. अंबाला शहर नागरिक अस्पताल में पहुंच रहे मरीजों के बीच भी इस तरह की परेशानी को लेकर जागरूकता और परामर्श की जरूरत महसूस की जा रही है.
पढ़ाई को लेकर बच्चों में बढ़ रही एंग्जायटी
अंबाला शहर नागरिक अस्पताल में कार्यरत होम्योपैथिक डॉक्टर रजिता ने Local18 को बताया कि आजकल बच्चों में पढ़ाई को लेकर एंग्जायटी का स्तर बढ़ता दिखाई दे रहा है. कई बार बच्चा किसी विषय को समझ नहीं पाता, लेकिन शिक्षक से दोबारा सवाल पूछने में झिझकता है. उसके मन में यह डर बैठ जाता है कि अगर उसने दोबारा पूछा तो दूसरे बच्चे उसे कम समझदार समझेंगे.
डॉ. रजिता के अनुसार, ऐसी सोच धीरे-धीरे बच्चे के अंदर मानसिक दबाव बढ़ा सकती है. बच्चा अपनी परेशानी किसी से साझा करने के बजाय उसे मन में ही रखता है. इसका असर उसके व्यवहार, पढ़ाई और रोजमर्रा की गतिविधियों पर दिखाई देने लगता है. इसलिए अभिभावकों को बच्चों की केवल पढ़ाई और नंबरों पर नहीं, बल्कि उनके व्यवहार में आने वाले बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए.
महिलाओं में इन कारणों से बढ़ सकता है मानसिक तनाव
उन्होंने बताया कि एंग्जायटी का असर महिलाओं में भी अलग-अलग कारणों से देखने को मिल सकता है. घर-परिवार की जिम्मेदारियां, लगातार तनाव और जीवन में होने वाले शारीरिक व हार्मोनल बदलाव भी महिलाओं की मानसिक स्थिति को प्रभावित कर सकते हैं. कई महिलाएं अपनी परेशानी परिवार के सामने व्यक्त नहीं कर पातीं और लंबे समय तक तनाव झेलती रहती हैं.
डॉ. रजिता ने बताया कि बहुत ज्यादा गुस्सा आना, चिड़चिड़ापन, किसी काम में मन न लगना, शरीर का लगातार थका हुआ महसूस होना, सिर में भारीपन और पूरे दिन घबराहट रहना एंग्जायटी से जुड़े लक्षण हो सकते हैं. हालांकि, इन लक्षणों के पीछे दूसरे शारीरिक या मानसिक कारण भी हो सकते हैं. इसलिए समस्या लगातार बनी रहे तो चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है.
मेडिटेशन और योग को दिनचर्या में करें शामिल
एंग्जायटी को नियंत्रित रखने के लिए डॉ. रजिता ने मेडिटेशन, योग, भ्रामरी और विभिन्न प्राणायाम को दिनचर्या में शामिल करने की सलाह दी. इसके साथ ही खान-पान पर भी ध्यान देना जरूरी है. तली हुई और अत्यधिक मिर्च-मसाले वाली चीजों का सेवन कम करने के साथ फल, पौष्टिक भोजन और पर्याप्त पानी को डाइट का हिस्सा बनाना चाहिए.
बच्चों का स्क्रीन टाइम भी करें नियंत्रित
उन्होंने कहा कि बच्चों की मानसिक सेहत के लिए स्क्रीन टाइम को भी नियंत्रित करना जरूरी है. बच्चों को मोबाइल और सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उन्हें इंटरनेट के सही इस्तेमाल के बारे में समझाना चाहिए. उनके स्क्रीन टाइम की सीमा तय करने के साथ सुबह टहलने, जॉगिंग और शाम को आउटडोर गेम खेलने के लिए प्रेरित किया जा सकता है.
बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ न डालें
डॉ. रजिता ने बताया कि सबसे अहम बात यह है कि माता-पिता बच्चों पर अपनी उम्मीदों का बोझ न डालें. उनकी कमजोरी और ताकत को समझकर उनका सहयोग करें और घर का माहौल ऐसा रखें कि बच्चा अपनी परेशानी खुलकर परिवार के साथ साझा कर सके.
पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, शारीरिक गतिविधि और परिवार का भावनात्मक सहयोग बच्चों और महिलाओं को तनाव से बाहर निकलने में मदद कर सकता है. समस्या ज्यादा बढ़ने पर विशेषज्ञ से परामर्श लेना सबसे सही कदम है.












