कभी चार स्कूल चलाते थे, आज वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर…झकझोर देगी रामचंद्र पांडे की ये कहानी

On: August 9, 2026 5:45 AM
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फरीदाबाद. हरियाणा के सोनीपत में वृद्धाश्रम की ये खबर आपने भी जरूर देखी सुनी होगी. 74 साल के शिवचरण रामरतन गुप्ता आखिरी सांस तक अपनी बेटियों का इंतजार करते रहे. बेटियां नहीं पहुंचीं तो 5100 रुपये भेजकर वीडियो कॉल के जरिए पिता की अंतिम विदाई देखी. यह खबर सामने आई तो लोगों ने रिश्तों में बढ़ती दूरियों पर सवाल उठाए. फरीदाबाद के एक वृद्धाश्रम में रहने वाले रामचंद्र पांडे की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. फर्क बस इतना है कि रामचंद्र पांडे आज भी जिंदा हैं और अपने अपनों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं.

रोहतास के रहने वाले

लोकल 18 से रामचंद्र पांडे बताते हैं कि मैं मूल रूप से बिहार के रोहतास जिला स्थित सासाराम का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 64 साल है. आज मैं फरीदाबाद के सेक्टर 10 के वृद्धाश्रम में रह रहा हूं. मैं कुरुक्षेत्र के एक वृद्धाश्रम से यहां पहुंचा हूं. साल 2015 से मैं वृद्धाश्रम में रह रहा हूं. कभी मेरी जिंदगी ऐसी नहीं थी कि मुझे किसी के सहारे की जरूरत पड़े. बिहार और झारखंड में मेरे चार स्कूल चलते थे. लाखों रुपये की आमदनी होती थी. लेकिन आज जिंदगी ने ऐसा मोड़ लिया कि अपने ही घर से दूर वृद्धाश्रम में रहने को मजबूर हूं.

बदल गया जिंदगी का रास्ता

रामचंद्र पांडे बताते हैं कि मेरे परिवार में पत्नी और दो बेटियां हैं. दोनों बेटियों की शादी हो चुकी है. मुझे मेरी बेटी की शादी में नहीं बुलाया गया. पहली बेटी की शादी के बाद उसका तलाक भी हो गया, ऐसा मुझे सुनने में आया है. रामचंद्र पांडे बताते हैं कि पत्नी के साथ घर में अक्सर लड़ाई झगड़ा होता था. हालात इतने बिगड़ गए कि पत्नी ने मुझे घर से निकाल दिया. साल 2015 में मैं घर से बाहर हो गया. इसके बाद पत्नी ने मेरे ऊपर केस भी कर दिया. वह केस साल 2018 में खत्म हुआ. इसके बाद से मेरी जिंदगी का रास्ता ही बदल गया.

6 माह कोमा में रहा

रामचंद्र पांडे बताते है कि साल 2012 से पत्नी के साथ मेरा विवाद शुरू हुआ था. इसके बाद साल 2013 में मेरा एक्सीडेंट हो गया. हादसा इतना गंभीर था कि मैं करीब 6 महीने तक कोमा में रहा. जब मुझे होश आया तो हालात पूरी तरह बदल चुके थे. रामचंद्र पांडे बताते हैं कि जब मैंने पत्नी के खिलाफ कुछ कदम उठाने की कोशिश की तो मामला उल्टा मेरे खिलाफ ही चला गया. इसके बाद मुझे घर से बाहर निकाल दिया गया. उस दिन के बाद परिवार से दूरी बढ़ती चली गई.

सबकुछ जीरो से शुरू किया

रामचंद्र पांडे बताते हैं कि मैंने अपनी जिंदगी में सबकुछ जीरो से शुरू किया था. पहले आठवीं तक का स्कूल खोला था. बाद में उसे दसवीं तक किया. बिहार और झारखंड में मेरे चार स्कूल थे. स्कूल चलने लगा तो उसमें शिक्षक और दूसरे कर्मचारियों को भी काम दिया. उनकी सैलरी भी देता था. रामचंद्र पांडे बताते हैं कि स्कूल से लाखों रुपये की आमदनी होती थी. बाद में मैंने स्कूल बेच दिया. आज भी स्कूल चल रहा है, लेकिन मैं वहां से पूरी तरह अलग हो चुका हूं.

पढ़ाई में आगे, कविता बनी साथी

रामचंद्र पांडे बताते हैं कि मैंने हिंदी से एमए किया है. बीएड भी किया है. पढ़ाई लिखाई से हमेशा मेरा जुड़ाव रहा. मुझे कविता लिखने का बहुत शौक है. मैं खुद कविताएं लिखता हूं. रामचंद्र पांडे बताते हैं कि जिस वृद्धाश्रम में आज रह रहा हूं, उसी पर मैंने एक कविता भी लिखी है. जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया, लेकिन आज लगता है कि इंसान के पास पैसा और पहचान हो, फिर भी अगर अपने साथ न हों तो सबकुछ अधूरा रह जाता है. रामचंद्र पांडे बताते हैं कि इस वृद्धाश्रम में मुझे किसी तरह की परेशानी नहीं है. यहां की व्यवस्था बहुत अच्छी है. मुझे यहां किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होती.

रामचंद्र पांडे की बातों में परिवार से दूर होने का दर्द जरूर दिखाई देता है, लेकिन वह किसी के खिलाफ शिकायत करते नजर नहीं आते. शायद यही उनकी कहानी का सबसे भावुक हिस्सा है कि जिस इंसान ने कभी दूसरों को रोजगार दिया, स्कूल चलाए और अपनी जिंदगी अपने दम पर खड़ी की, वही आज अपने आखिरी पड़ाव पर दूसरों के सहारे जी रहा है.

सोनीपत की घटना ने उठाए सवाल

सोनीपत के शिवचरण गुप्ता की कहानी सामने आने के बाद बुजुर्गों और परिवार के रिश्तों को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है. रामचंद्र पांडे की कहानी भी यही सवाल खड़ा करती है कि आखिर उम्र के उस पड़ाव पर जब इंसान को सबसे ज्यादा अपनों की जरूरत होती है, तब वह अकेला क्यों रह जाता है. रामचंद्र पांडे आज फरीदाबाद के वृद्धाश्रम में हैं. उनके पास रहने के लिए छत है, खाने की व्यवस्था है और देखभाल करने वाले लोग हैं. लेकिन अपनों का साथ और परिवार का वह रिश्ता, जिसकी कमी कोई वृद्धाश्रम पूरी नहीं कर सकता, वह आज भी उनकी जिंदगी से दूर है.

वैशाली वर्मा

वैशाली वर्मा पत्रकारिता क्षेत्र में पिछले 3 साल से सक्रिय है। इन्होंने आज तक, न्यूज़ 18 और जी न्यूज़ में बतौर कंटेंट एडिटर के रूप में काम किया है। अब मेरा हरियाणा में बतौर एडिटर कार्यरत है।

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