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Faridabad Kanwar Yatra : 85 साल की उम्र में भी चंदर सिंह का हौसला कायम है. बल्लभगढ़ के सागरपुर गांव निवासी चंदर 35 साल से लगातार हरिद्वार पैदल कांवड़ लेने जा रहे हैं. इस बार भी उन्होंने करीब 300 किलोमीटर का सफर पैदल तय किया. इस सफर में 75 साल की उनकी पत्नी अशर्फी भी पिछले 15 साल से चंदर का साथ निभा रही हैं. लोकल 18 से चंदर सिंह कहते हैं कि 1 अगस्त को अपने गांव सागरपुर से कांवड़ लेने के लिए हरिद्वार के लिए निकला था. करीब 10 दिन पैदल चलकर बल्लभगढ़ पहुंचा. इस दौरान एक दिन में 25 से 30 किलोमीटर तक पैदल चलता रहा. भोलेनाथ की कृपा से सफर आराम से पूरा हो गया. रास्ते में कांवड़ियों के लिए खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था थी.
फरीदाबाद. उम्र चाहे कितनी भी हो, अगर मन में आस्था और हौसला हो तो बड़े से बड़ा सफर भी आसान लगने लगता है. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है बल्लभगढ़ के सागरपुर गांव के रहने वाले 85 साल के चंदर सिंह ने. जिस उम्र में आमतौर पर लोगों के लिए कुछ दूरी तक पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, उस उम्र में चंदर सिंह करीब 300 किलोमीटर पैदल चलकर हरिद्वार से कांवड़ लेकर अपने पैतृक गांव सागरपुर पहुंचे. इस पूरे सफर में उनकी 75 साल की पत्नी अशर्फी भी उनके साथ रहीं. दोनों पति-पत्नी ने रास्ते की मुश्किलों की परवाह किए बिना भोलेनाथ की भक्ति में करीब 300 किलोमीटर का सफर तय किया.
सफर और भी आसान
चंदर सिंह ने लोकल 18 को बताया कि मेरी उम्र 85 साल है. मैं पिछले 35 सालों से लगातार कांवड़ लेने के लिए हरिद्वार जा रहा हूं. बल्लभगढ़ के सागरपुर गांव से हरिद्वार करीब 300 किलोमीटर दूर है. मैं हर साल पैदल ही जाता हूं. 1 अगस्त को अपने गांव सागरपुर से कांवड़ लेने के लिए हरिद्वार के लिए निकला था और करीब 10 दिन में पैदल चलकर बल्लभगढ़ पहुंचा. एक दिन में 25 से 30 किलोमीटर तक पैदल चलता था. मेरे साथ मेरी पत्नी अशर्फी भी थीं. मुझे रास्ते में किसी प्रकार की कोई दिक्कत या परेशानी नहीं हुई. भोलेनाथ की कृपा से पूरा सफर आराम से पूरा हुआ और पैरों में भी किसी तरह की दिक्कत नहीं हुई. रास्ते में कांवड़ियों के लिए खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था थी, जिसकी वजह से सफर और भी आसान हो गया.
सावन आते ही उठने लगती है इच्छा
चंदर सिंह बताते हैं कि रास्ते में मुझे खीर भी मिलती थी, पूड़ी और सब्जी भी मिलती थी. जगह-जगह फल भी मिलते थे. केला और सेब समेत कई तरह के फल कांवड़ियों को दिए जाते थे. रास्ते में खाते-पीते और आराम करते हुए हम दोनों पति पत्नी हरिद्वार से अपने गांव तक पहुंच गए. चंदर सिंह बताते हैं कि मैं किसान हूं, हालांकि अब घर पर ही रहता हूं. मेरे पांच बच्चे हैं. अशर्फी बताती हैं कि मेरी उम्र 75 साल है. पिछले 15 सालों से अपने पति के साथ कांवड़ लेने के लिए जा रही हूं. हम दोनों आराम से 300 किलोमीटर चल लेते हैं. जैसे ही सावन का महीना आता है, मन में कांवड़ लेने जाने की इच्छा होनी लगती है. दोनों के सागरपुर गांव पहुंचने पर परिवार के लोगों में भी जबरदस्त उत्साह देखने को मिला. घर लौटे बुजुर्ग दंपती का परिवार ने जोरदार स्वागत किया और उनकी भक्ति और हौसले की हर तरफ चर्चा होने लगी.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…
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