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Pakistan wali mata ambala : 1947 में लाखों लोग पाकिस्तान में सब कुछ गंवाकर अपने साथ आस्था और विरासत लेकर आए थे. अंबाला का झावरियां वाली माता का मंदिर इसकी जीवंत मिसाल है. 75 साल पहले पाकिस्तान के झावरियां गांव से माता की प्रतिमा लाकर अंबाला में स्थापित की गई थी. लोकल 18 से मंदिर के पुजारी उमेश शर्मा बताते हैं कि इस मंदिर को केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विभाजन के दौर की स्मृतियों से जुड़ा स्थान भी माना जाता है. यह स्थान झावरियां वाली माता के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो चुका है. लोग इस मंदिर को प्यार से ‘पाकिस्तान वाली माता’ भी कहते हैं.
अंबाला. देश का बंटवारा सिर्फ सीमाओं के बदलने की कहानी नहीं है. 1947 में लाखों लोग अपना घर, जमीन और पुरानी यादें पीछे छोड़कर भारत आए थे. लोग अपने साथ आस्था और विरासत भी लेकर आए. अंबाला शहर के रामपुरा मोहल्ले में स्थित झावरियां वाली माता का मंदिर इसकी जीवंत मिसाल है. मान्यता है कि करीब 75 साल पहले पाकिस्तान के झावरियां गांव से माता की प्रतिमा लाकर अंबाला में स्थापित किया गया. आज यह मंदिर आस्था का केंद्र बन चुका है. मंदिर से जुड़ी मान्यता के अनुसार, पाकिस्तान के झावरियां गांव में बाबा फुलू कुएं की खुदाई करवा रहे थे. इसी दौरान उन्हें माता ने कन्या के रूप में दर्शन दिए. खुदाई के दौरान धरती से खून की धारा निकलने लगी, बाद में माता की एक प्रतिमा भी निकली.
हालात बदल गए
इस घटना के बाद उस स्थान को माता की शक्ति से जोड़कर देखा गया और वहां मंदिर की स्थापना की गई. धीरे-धीरे यह स्थान श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गया. लेकिन 1947 में देश के विभाजन के बाद हालात बदल गए. लोगों को अपना घर छोड़कर भारत आना पड़ा. इसी दौरान बाबा फुलू भी भारत पहुंचे. मान्यता है कि उन्होंने पाकिस्तान छोड़ते समय माता की प्रतिमा को अपने साथ लिया और अंबाला के रामपुरा मोहल्ले में इसकी स्थापना की. इसके बाद से ही यह स्थान झावरियां वाली माता के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया.
वंशज बढ़ा रहे परंपरा
लोकल 18 से मंदिर के पुजारी उमेश शर्मा बताते हैं कि माता की प्रतिमा से जुड़ी कई पुरानी मान्यताएं आज भी श्रद्धालुओं के बीच प्रचलित हैं. प्रतिमा पर कस्सी का निशान आज भी देखा जा सकता है. मान्यता है कि यह निशान पाकिस्तान के झावरियां गांव में कुएं की खुदाई के दौरान हुई घटना से जुड़ा है. पंडित उमेश शर्मा बताते हैं कि इस मंदिर की सबसे खास बात यह भी है कि पूजा-पाठ की परंपरा आज तक बाबा फुलू के परिवार से जुड़ी हुई है. उनके वंशज मंदिर की परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं. यही वजह है कि मंदिर को केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि विभाजन के दौर की स्मृतियों से जुड़ा स्थान भी माना जाता है.
सब कुछ खोकर भी बचाए रखी आस्था
पुजारी उमेश शर्मा के मुताबिक, रामपुरा मोहल्ले में स्थित इस मंदिर में सामान्य दिनों में भी श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं. नवरात्र और दूसरे धार्मिक पर्वों पर यहां भक्तों की संख्या काफी बढ़ जाती हैं. लोग इस मंदिर को प्यार से ‘पाकिस्तान वाली माता’ भी कहते हैं. एक तरफ मंदिर में रोज घंटियों की आवाज गूंजती है, तो दूसरी तरफ इसकी कहानी उस दौर की याद दिलाती है जब लोगों ने सब कुछ खोकर भी अपनी आस्था को बचाए रखा.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…
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